नए वर्ष में महिलाओं को बेहतर कारोबार की उम्मीद है। इसके लिए उनको बाजार चाहिए। सेवा के काम से जुड़ीं महिलाओं ने कहा कि समय से ऋण देना भी उनके लिए चुनौती है। ऐसे में काम बेहतर चले, इसके लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है।
जिले में करीब साढ़े सात हजार महिला स्वयं सहायता समूह हैं। इनमें से करीब 3500 समूह ऐसे हैं जो किसी न किसी प्रकार के काम से जुड़े हैं। 65 समूह ऐसे हैं जो उत्पादन का काम करते हैं। अन्य समूह की महिलाएं दुग्ध उत्पादन, दुकानदारी, ब्यूटी पार्लर, खेती किसानी जैसे काम करती हैं।
इन महिलाओं को विभाग से मदद के साथ ही एक बाजार उपलब्ध कराए जाने की दरकार है। महिलाओं का मानना है कि कारोबार बेहतर हो सकता है, इसके लिए अपने स्तर से प्रयास किया जा रहा है। मेहनत के बावजूद सीमित बाजार, महंगे कच्चे माल और विपणन सुविधाओं की कमी के चलते कई समूह अपेक्षित लाभ नहीं कमा पा रहे हैं।
समूह की महिलाओं को उम्मीद है कि 2026 में ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत प्रशिक्षण के साथ-साथ विपणन की व्यवस्था होगी। अगर सरकारी कार्यालय, स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्रों में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दी जाए तो समूहों को बड़ा सहारा मिल सकता है। महिलाओं का मानना है कि नए साल में सही मार्गदर्शन और बाजार मिलने पर स्वयं सहायता समूह आत्मनिर्भरता की मजबूत मिसाल बन सकते हैं।
उपायुक्त स्वत: रोजगार सुखराज बंधु ने बताया कि महिलाओं को समूह के माध्यम से काम मिले, इसका विभाग प्रयास करता रहता है। बीते दिनों आश्रम पद्धति स्कूलों में समूहों को खाना बनाने का काम दिया गया है। इसके अलावा जिला अस्पताल, मेडिकल कॉलेज समेत अन्य चिकित्सालय में महिला के लिए प्रेरणा कैंटीन का संचालन किया जा रहा है। इनको आर्थिक मदद के साथ ही समय-समय पर प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
ऋण लेकर महिलाएं पशुपालन, ई-रिक्शा और गोशाला में खाद बनाने का काम कर रहीं हैं। सामान बेचने के लिए स्थायी बाजार जरूरी है। मेले या कभी-कभार लगने वाली हाट से घर नहीं चलता। इसके लिए स्थायी बाजार होना जरूरी है। - पिंकी देवी, बैंक सखी
अगर विभाग हमारे बनाए उत्पादों को शहर के बाजार या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ दें तो आमदनी बढ़ सकती है। बैंक से ऋण लेकर अगर कारोबार नहीं चला तो उसकी भरपाई करना सबसे बड़ी चुनौती होता है। -प्रियंका सिंह, समूह सखी
पिंकी देवी, बैंक सखी