हादसे में जान गंवाने वाली उत्तरा देवी के बेटे जितेंद्र की आंख रोते-रोते सूज गई थीं। पोस्टमार्टम हाउस में लगातार वह यही कहता रहा कि उसने मां को जाने से रोका था, मान जाती तो यह दिन देखने को न मिलता।
जितेंद्र ने बताया कि शनिवार को भी उसकी मां मिट्टी लेने तालाब की ओर जा रही थीं। उसने उन्हें रोक लिया था। उसे लगा था कि अब मां मिट्टी लेने नहीं जाएगी लेकिन रविवार की सुबह किस्मत ने सब छीन लिया। उसने बताया कि पिता नोखेलाल तड़के भट्ठे पर मजदूरी करने चले गए थे। घर में वह सो रहा था और उसकी बहन रसोई में काम कर रही थी। इसी दौरान पड़ोसियों व गांव के लोगों को मिट्टी ले जाते देखकर उसकी मां भी चुपचाप मिट्टी लेने तालाब की ओर निकल गईं।
कुछ ही देर बाद गांव में अचानक चीख-पुकार मच गई। जितेंद्र की नींद खुली तो देखा लोग दौड़ रहे थे। वह भी घबराकर उनके पीछे भागा। रास्ते में किसी ने बताया कि तालाब किनारे मिट्टी का बड़ा टीला ढह गया है और कई लोग दब गए हैं। घटनास्थल पर पहुंचकर उसने जो दृश्य देखा, वह उसकी जिंदगी का सबसे भयावह पल था। ग्रामीण मिट्टी हटाकर लोगों को निकाल रहे थे, जिसमें उसकी मां भी थी।