हर पिता की आखिरी ख्वाहिश रहती है उसकी चिता को बड़ा बेटा ही मुखाग्नि दे। यही हिंदू धर्म के रीति-रिवाज भी कहते हैं। विडंबना देखिए की रुपये की मार ऐसी पड़ी कि भरवारी का विजय कुमार चाह कर भी पिता को मुखाग्नि नहीं दे सका। सुल्तानपुर तक पहुंचने के लिए लोगों के आगे वह गिड़गिड़ाता रहा, नोट बदलने की दुहाई देता रहा, लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी। हाथों से चेहरा छिपाकर दहाड़े मारकर अकेले में बस रोता रहा और कलपता रहा।
सुल्तानपुर के जगदीशपुर कमरौली निवासी विजय कुमार की भरवारी में ससुराल है। वह यहीं परिवार समेत रहता है और ट्राली चलाकर परिजनों का पेट भरता है। विजय के पिता फूलचंद्र की कई दिनों से तबियत खराब थी। शनिवार की शाम को विजय के पिता की मौत हो गई। छोटे भाई अजय ने इसकी जानकारी फोन पर दी तो विजय घर जाने के लिए व्याकुल हो गया। फुटकर पैसे नहीं थे। सुबह होते ही वह पांच सौ की दो नोट लिए उसको भुनाने के लिए परेशान हो गया।
बैंक की लाइन देख वह भाग आया। इसके बाद एक-दूसरे से वह मदद मांगने लगा, लेकिन कोई उसकी मदद को तैयार नहीं हुआ। इस दौरान उसके पास दर्जनों बार फोन घर से आए। दोपहर बाद जब फोन आया कि पिता का अंतिम संस्कार हो गया है तो विजय घुटने टेक कर रोने लगा। वह यही कहता रहा कि ऐसी कमाई का वह क्या करें, जो किसी काम न आए। पिता की अंत्येष्टि में शामिल न होने पाने का उसे बेहद मलाल है। वह सरकार के इस फैसले पर बेहद क्रोधित भी है।