जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर वोट जातीय समीकरणों के जाल में ही फंसा रहा। जातियां हावी रहीं, बिरादरी के लोगों का वर्चस्व दिखा। यही कारण था कि तीनों सीटों पर चुनाव रोचक हो गया। मतदाताओं का रुख उनके खेमे से भांपा गया। सपा-कांग्रेस गठबंधन, बसपा और बीजेपी में बराबर की मार थी। एक-एक वोट की खींचतान हर बूथ पर है। ये बात दूसरी है कि कहीं कोई आगे तो कहीं कोई पीछे। किसी बूथ पर सपा की साइकिल कांग्रेस के पंजे की पकड़ से भाग रही थी, तो कहीं भगवा झंडे के साथ कमल खूबसूरती से मुस्कुरा रहा था। इन सबके बीच हाथी की मतवाली चाल हर बूथ पर बनी रही। यही कारण है कि राजनीतिक पंडितों का गणित गड़बड़ हो गया है। आंकलन करने वाले एक दूसरे का मुंह ताकते रहे। वोटर अपने घर में था और मठाधीश बंद कमरे में कयासबाजी लगाते रहे। चाय-पान की दुकानों की बात अलहदा थी। गुमटी में कुछ बात थी, चाय-पान की दुकान में कोई और बात। बातें हर तरह की हुई, लेकिन जुबानी परिणाम अटका ही रहा। इससे चुनाव के परिणाम को लेकर राजनीतिक दलों व मतदाताओं के बीच उत्सुक्ता बढ़ गई है।
मंझनपुर विधानसभा
गढ़ है बीसपी का, लेकिन इतिहास गवाह है यहां बीएसपी कमजोर ही रही। नेहरू नगर में दोपहर तीन बजे के बाद तक 77 फीसदी मतदान हो चुका था। यह ऐसा वार्ड हैं, जहां सपा, बीएसपी और बीजेपी के मतदाताओं का भरपूर मिश्रण है, लेकिन चक नगर प्रथम में हाथी के कदम आगे बढ़ते दिखे, वहीं चमनगंज में साइकिल रफ्तार में दिखी। इसके अलावा चकनगर द्वितीय में भाजपा व साइकिल में मार दिखी। आजाद नगर में यही स्थिति थी। मंझनपुर के हर बूथ पर सपा, बसपा और बीजेपी के बीच लड़ाई थी। नेता नगर में बीजेपी जरूर हावी थी। करारी में सपा की वोट दिखी तो भाजपा कम नहीं थी। वहीं बसपा खेमे का उत्साह भी अपने-अपने मोहल्ले में भरपूर था। गांव-देहात में यही स्थिति रही। अपने-अपने गढ़ में सब हावी थे। जातीय बाहुल्य गांवों में प्रत्याशियों ने चढ़ाई की तो दूसरे इलाकों में उन्होंने सेंधमारी भी खूब की। इस सीट पर मुस्लिम व ब्राह्मण वोट जीत का सेहरा प्रत्याशी के सिर बंधेगा।
चायल विधानसभा
मतदान के पहले तक साफ कही जा रही चायल की तस्वीर, एकदम से धुंधली दिखी। मतदाता खामोश था, लेकिन राजनीतिक दलों का बस्ता चुनाव का रोमांच बढ़ा रहा था। बागियों की भूमिका ने इस सीट को मझधार में फंसा दिया है। सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रत्याशी की बयार थी तो बीजेपी व बीएसपी के उम्मीदवारों की भी कहीं-कहीं लहर थी। पर्दे के पीछे यहां मतदाताओं ने खूब खेल किया। भरवारी नगर पंचायत में अपना दल (कृष्णा गुट) ने दस्तक दी है तो सपा-कांग्रेस गठबंधन का उत्साह था। इससे परेशान बीजेपी को सरायअकिल ने काफी हद तक राहत दी। मूरतगंज ब्लाक में भिड़ंत तगड़ी है तो नेवादा ब्लाक में बीजेपी के कमल की खिलखिलाहट पूरे शबाब पर है। कुल मिलाकर यहां भी चुनावी तस्वीर स्पष्ट नहीं। यहां सबका झंडा बुलंद है। अपने-अपने इलाके में राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों ने अपनी ताकत दिखाई, लेकिन बागी उम्मीदवार हैं कि उन्हें दंभ भरने नहीं दे रहे हैं।
सिराथू विधानसभा सीट
बीजेपी के उम्मीदवार को यहां टिकट घोषणा के बाद कम आंका जा रहा था। चुनाव के आखिरी वक्त में यहां बीजेपी ने अपनी पकड़ मजबूत बना ली थी। मतदान के दिन इसका एहसास मतदाताओं ने भी कराया। सिराथू नगर पंचायत में बीजेपी हावी रही तो सपा-बसपा ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। सिराथू कस्बे से बाहर गांवों में सपा ने साइकिल की रफ्तार दिखाई। कहीं बीएसपी पीछे पड़ी थी तो कहीं बीजेपी। भदवां, टेंगाई जलालपुर आदि गांवों में बीएसपी ने अपनी उड़ान भी दोनों दलों को बताई। फतेहपुर से सटे गांवों में तीनों दलों में एक-एक वोट के लिए मारामारी दिखी। जातीय समीकरणों के आधार पर यहां मतदाताओं का रुख भी बदलता नजर आया। इस सीट पर ऊंट किस करवट बैठेगा, यह लोग नहीं बता पा रहे हैं। यहां असरदारों की भूमिका जरूर अहम रही। उन्होंने अपने-अपने इलाके के वोट किस तरह घुमा दिए, यह राजनीतिक दल नहीं भांप पाए।