भरवारी (कौशाम्बी)। बेरहम लपटों ने बृहस्पतिवार की रात कोखराज की राजकली की जिंदगी स्याह कर दी। लपटों ने उसका घर ही नहीं जीने का सहारा इकलौते बेटे उमेश को भी छीन लिया। बेटे की झुलसी लाश देख वह बुत बन गई है। उसकी हालत देख गांववाले भी गमगीन हैं। ढांढस बंधाने वाले भी अपने आंसू नहीं रोक पा रहे हैं।
मजदूर परिवार में जन्मी राजकली की जिंदगी दर्द की किताब बनी हुई है। शादी के कुछ साल बाद ही अनबन होने पर पति ने तीन मासूम बच्चों समेत उसे घर से भगा दिया था। तीनों बच्चों को लेकर वह पिता के घर आ गई। यहीं मेहनत मजदूर करके बच्चों को पालने लगी। बच्चों के साथ मायके में रहते हुए वह पति से अलगाव को भूल ही रही थी तभी छोटे भाई की मौत हो गई। 5 साल पहले पति के मरने की भी मनहूस खबर आई। भाई और पति के गमों में चूर राजकली से कुछ दिन पहले उसका बड़ा भाई अलग होकर पत्नी-बच्चों के साथ दूसरे घर में रहने लगा था।
उसने बूढ़े मां-बाप और बेटे के साथ मेहनत मजदूरी करते हुए किसी तरह अपनी दोनों बेटियों के हाथ पीले किए। बेटा बड़ा हो गया था। उसे लगा कि अब दुख भरे दिन बीतने वाले हैं। मगर बृहस्पतिवार रात बेरहम लपटों ने उसका सब कुछ छीन लिया। जिस बेटे के लिए रोटियां सेंकने को उसने आग जलाई थी वही आग उसके लिए जीवनभर का काल बन गई। घर में भड़की बेरहम आग में झुलसने से उसके इकलौते बेटे की भी मौत हो गई। बुढ़ापे में सहारा बनने वाली लाठी जलकर राख हो चुकी थी। झुलसे बेटे की लाश देख राजकली कुछ देर तो दहाड़ें मार-मारकर रोती रही पर यह हादसा उसके ऊपर गमों का पहाड़ बनकर ऐसा टूटा जिसने उसे बुत बना दिया है। उसके बहते आंसू पोंछने की कोशिश करने वाली गांव की महिलाएं भी खुद को सिसकने से नहीं रोक पा रही हैं। गम में डूबे बूढ़े नाना, नानी और दोनों बहनों का भी कुछ ऐसा ही हाल है।