गोमती देवी बेकसूर थी..., बेगुनाह थी...। कत्ल के बाद खाकी ही इंसाफ की राह में रोड़ा बन गई। खूनी खेल पर पर्दा डालने के लिए पुलिस गोमती का शव गंगा में डुबाती रही और वह सच की जीत के लिए बार-बार उतराती रही। जीवनदायिनी गंगा अबला के शव के बोझ को अपनी गोद में समा नहीं सकी और दस किलोमीटर दूर संदीपन घाट के समीप किनारे लगा दिया। इंसाफ की पुकार के आगे खाकी हारी और गोमती के परिजनों की उम्मीद जीत गई। शव मिलने के बाद से वह पुलिसकर्मी बौखलाएं हैं, जिन्होंने शव गायब करने के नाम पर कातिलों से ज्यादा गुनाह किया है।
कत्ल के बाद सैनी कोतवाली के घोसियाना सिपाह गांव के जंगल से रविवार की शाम गायब हुआ गोमती देवी का शव आखिरकार छह दिन बाद कोखराज के संदीपन घाट के समीप मिल गया। शव मिलते ही गोमती के पति सुरेश चंद्र, बेटे लवलेश और शैलेश कुमार को इंसाफ मिलने की आश जगी है। परिजनों को अब लग रहा है कि कातिलों को जल्द ही सजा मिलेगी। शव मिलने से वह पुलिसकर्मी जरूर बौखलाएं हैं, जिन्होंने इंसाफ की राह में दीवार बनकर गोमती देवी का शव गायब किया था। गोमती देवी का कत्ल हुआ था। ये घटनास्थल चीख-चीख कर कह रहा है। इसके बाद भी रविवार की शाम को मौका-मुआयना कर घटना की तफ्तीश करने के बजाय पुलिस ने शव को ठिकाना मुनासिब समझा।
जिसे कानून की निगाह में सबसे बड़ा गुनाह और पुलिस मैनुअल में सबसे बड़ी लापरवाही करार दिया गया है। इसके बाद भी दुस्साहस की सीमा पार करते हुए पुलिस कर्मियों ने शव को गंगा में फिंकवाया, लेकिन इस राज पर से बुधवार को पर्दा उठा। दोबारा मानिकपुर थाने की पुलिस ने यही काम किया। बार-बार गोमती देवी को गंगा में डुबोकर सच छिपाने की कोशिश की गई, लेकिन शव था कि बार-बार किनारे लगता रहा। शव मिल गया है। पोस्टमार्टम भी हो चुका है। अब जांच अधिकारी को यह तय करना है कि शव फेंकने वाले कौन पुलिस कर्मी थे? निलंबन व लाइन हाजिर होने वाले पुलिस कर्मी ही थे अथवा कोई दूसरे भी शामिल हैं। साथ ही गोमती देवी को मौत के घाट उतारने वाले कौन लोग हैं? इसकी क्या वजह थी? ये सारे सवाल अब पुलिस के लिए चुनौती बने हैं, जिन्हें सुलझाने के लिए कई टीमें सक्रिय हैं।