परिषदीय स्कूलों में विद्यालय विकास की आड़ में सरकारी रकम का गोलमाल किया जा रहा है। विभागीय अफसरों के इशारे पर स्कूलों में बगैर टेंडर के व्हाइट बोर्ड लगवाया जा रहा है। चुनिंदा फर्मों के जरिए बाजार भाव से दो-तीन गुना कीमत पर बोर्ड की सप्लाई कर अफसर मालामाल हो रहे हैं।
विद्यालय विकास के लिए शासन की ओर से छात्र संख्या के आधार पर कंपोजिट ग्रांट भेजी गई है। जिन विद्यालयों में एक से 100 तक की संख्या है वहां 25 हजार, 101 से 250 तक की संख्या में 50 हजार, 251 से 500 तक में 75 व 501 से ऊपर की छात्र संख्या वाले स्कूलों को एक लाख रुपये भेजा गया है। इस रकम से विद्यालय प्रबंध समिति को स्कूल का विकास करना है। शासन की ओर से भेजी गई लाखों की रकम पर जिले के विभागीय अफसरों की निगाह लग गई है। बताया जा रहा है कि अधिकारी अपनी मर्जी से रकम खर्च करवा रहे हैं। ताजा मामला स्कूलों में व्हाइट बोर्ड की खरीद का सामने आया है।
विभागीय अफसरों ने स्कूलों के जिम्मेदारों को प्रत्येक कक्षा में व्हाइट बोर्ड लगवाने का मौखिक निर्देश दिया है। जिले के 930 प्राइमरी स्कूलों में पांच-पांच तथा जूनियर विद्यालयों में तीन-तीन बोर्ड लगाए जा रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर शिक्षकों ने बताया कि बगैर किसी टेंडर के बोर्ड की सप्लाई चुनिंदा फर्मों से कराई जा रही है। अफसर के इस खेल से शिक्षक परेशान हैं। दरअसल फर्म द्वारा हर ब्लॉक क्षेत्र में अलग-अलग दर से सप्लाई की जा रही है। नेवादा ब्लॉक के स्कूलों में सप्लाई करने वाली फर्म 2800 रुपये प्रति बोर्ड, मंझनपुर में 2200 रुपये मूरतगंज में 2000, सरसवां में 1600 तथा कड़ा क्षेत्र के स्कूलों में नौ से एक हजार रुपये की दर से वसूली की जा रही है। इसके विपरीत कुछ ब्लॉकों में शिक्षकों ने अपने हिसाब से महज चार से छह सौ रुपये कीमत में ही बोर्ड की खरीदारी की है। जूनियर शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष अजय पांडेय का कहना है कि सोमवार को बीएसए से मिलकर मामले की शिकायत की जाएगी।
कंपोजिट ग्रांट खर्च करने का अधिकार विद्यालय प्रबंध समिति को है। विद्यालय विकास के लिए समिति इस मद में मिलने वाली धनराशि का अपने हिसाब से खर्च कर सकते हैं। इसमें विभाग का कोई हस्तक्षेप नहीं है। यदि कोई विभागीय इसके लिए दबाव बनाता है तो प्रकरण की जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
अरविंद कुमार, बीएसए