कौशाम्बी में उत्खनन के दौरान मिला अशोक स्तंभ।
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सन् 399 से 414 ईसवी के मध्य चीनी बौद्ध यात्री फाहियान और 629-645 ईसवी के मध्य ह्वेनसांग कौशाम्बी आए थे। फाहियान ने लिखा है कि राजा उदयन के महल में गुंबद के नीचे गौतम बुद्ध की लाल चंदन से बनी काष्ठ की प्रतिमा रखी गई थी। जबकि घोषिताराम बौद्ध बिहार की स्थिति अच्छी नहीं थी। वहीं ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक सी-यू-की में लिखा है कि प्रयागराज से 38 मील दूर दक्षिण पश्चिम दिशा में यमुना नदी किनारे स्थित बौद्ध बिहार ध्वस्त हो चुका था। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1861 में प्राचीन नगर कौशाम्बी की खोज की थी। जो इनकी पुस्तक प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल में दर्ज है।
खोज के 76 साल बाद नानी गोपाल मजूमदार ने शुरु कराया उत्खनन
बुद्ध स्थली की खोज के तीन साल पहले 1857 की गदर से प्रयागराज भी अछूता नहीं था। क्रांतिकारी मोलबी लियाकत अली ने साथियों संग अंग्रेजो की नाक में दम कर रखा था। यही कारण था कि प्राचीन कौशाम्बी का उत्खनन कार्य रोक दिया गया था। 76 साल बाद भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की ओर से 1936-37, 37-38 में प्रोफेसर नानी गोपाल मजूमदार ने टीले के मध्य स्थल पर उत्खनन कार्य प्रारम्भ किया। जहां मलबे में दबा अशोक स्तम्भ मिला था। इसी के बाद निदेशक सर जॉन मार्शल ने मजूमदार को ब्लूचिस्तान के रोहेलजी कुंड पुरातत्विक स्थल पर भेज दिया था। जहां उनकी हत्या होने से बुद्ध स्थली का उत्खनन कार्य फिर से रुक गया था।
इसी नगर से गुजरता था प्राचीन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, धर्म, और व्यापार
कौशाम्बी नगर मध्य में होने के चलते प्राचीन भारतीय संचार और नदी यातायात का महत्वपूर्ण व्यापारिक संग्रह केंद्र था। यहां के सेठ घोषिताराम व्यापारियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध थे। यह नगर भूमि मार्ग से जहां उत्तरापथ से जुड़ा था। वहीं, दूसरी तरफ दक्षिणापथ मार्ग यमुना नदी के जल मार्ग बंदरगाह से जुड़ा था। यही दोनों मार्ग छोटे बड़े राज्यो को एक साथ जोड़कर प्राचीन भारत (जम्बू दीप) को एक महान साम्राज्य बनाता था। इतिहासकार कुरुष दलाल के अनुसार गंधार (अफगानिस्तान) से लेकर ताम्रलिप्तिका (बंगाल की खाड़ी) तक को उत्तरापथ मार्ग व मगध से लेकर कौशांबी से प्रतिष्ठान एवं महिष्मति (महेश्वर व दक्कन) तक को दक्षिणापथ मार्ग कहा जाता था।
उस समय के बड़े व्यापारी बौद्ध हुआ करते थे। वह अपना धर्म, संस्कृति और आस्था अपने साथ लेकर चलते थे। व्यापारियों के जरिये ही बौद्ध धर्म अफगानिस्तान होकर चीन में प्रवेश किया था। बौद्ध यात्री फाह्यान और ह्वेन त्सांग (युआन च्वांग) उत्तरापथ मार्ग से कौशांबी आये थे। उत्तरापथ मार्ग पर चीन से रेशम, अफगानिस्तान से घोड़े, लपीस लाजुली कीमती पत्थरों का व्यापार किया जाता था। जबकि दक्षिणापथ मार्ग से मसाले, मलमल और मोती आदि का व्यापार होता था। जो ताम्रलिप्तिका बंदरगाह से होकर सीलोन (श्रीलंका) कंबोज (कंबोडिया) तक बौद्ध धर्म पहुंचाने का काम किया।