अब जिले की ऊसर जमीन भी सरसों की काली मोती उगलेगी। पीले-पीले फूलों से खेत लहलहाएंगे। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल (हरियाणा) ने सरसों की नई प्रजाति सीएस-64 विकसित की है। जो खारी और ऊसर मिट्टी में भी बेहतर उत्पादन दे सकती है।
इस प्रजाति का प्रदर्शन कृषि विज्ञान केंद्र कर रहा है। पहली बार चार किसानों को परीक्षण के लिए बीज दिया गया है। उत्पादन बेहतर रहा तो अन्य किसानों को भी बीज उपलब्ध कराया जाएगा। इससे जिले की 12 हजार हेक्टेयर ऊसर भूमि में सरसों के बेहतर उत्पादन की उम्मीद है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार सिंह ने बताया कि इस साल जिले में चयनित चार किसानों को सीएस-64 बीज दिया गया है। इनके खेत में इस बीज का परीक्षण किया जाएगा। अगर उत्पादन संतोषजनक रहा तो अगले साल से इसे अन्य किसानों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।
उन्होंने बीज की खासियत बताते हुए कहा कि सामान्य सरसों के बीज से उत्पादन प्रति हेक्टेयर 20 से 22 क्विंटल तक होता है, वहीं सीएस-64 से 25 से 27 क्विंटल तक उत्पादन होने की संभावना है।
उन्होंने कहा कि नई किस्म में तेल की मात्रा भी लगभग 40 फीसदी है, जो इसे आर्थिक रूप से और अधिक उपयोगी बनाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह किस्म उन क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो सकती है जहां मिट्टी में लवणता अधिक है और सामान्य फसलें नहीं उग पातीं।
बता दें कि जिले में लगभग 12 हजार हेक्टेयर भूमि ऊसर श्रेणी में आती है। यदि सीएस-64 का परीक्षण सफल रहा तो यह क्षेत्र न सिर्फ उपजाऊ बनेगा बल्कि किसानों की आमदनी भी बढ़ेगी। जिला कृषि अधिकारी सुरुचि विश्वकर्मा ने बताया कि सीएस-64 सरसों से जिले की बंजर भूमि भी अब तेल उत्पादन का बड़ा जरिया बन सकती है।
बोले किसान
- करीब एक बीघा खेत ऊसर है। नई प्रजाति का बीज मिला है। इसकी बोआई कर दी गई है। अगर उत्पादन वैज्ञानिकों के बताने के अनुरूप हुआ तो ऊसर खेत से भी आमदनी होगी। - अरविंद कुमार,बैगवां फतेहपुर
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- खेत में ऊसर सुधार का काम हुआ लेकिन अब भी उतना उत्पादन नहीं होता कि लाभ आम खेत की तरह हो सके। इस नई फसल से बेहतर होने की उम्मीद है। - राम लखन यादव, छबिलवा चायल