उन्होंने खेती का तरीका बदला। पारंपरिक फसलों को छोड़ कर केले की खेती शुरू की। उनकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे तंगी दूर होने लगी। वर्ष 1995 तक बच्चा लाल 10 बीघे भूमि खरीद चुके थे। इसके बाद अंगद पिता के रास्ते पर चले और केले की खेती का दायरा बढ़ाते गए। मुनाफा हुआ तो जमीन भी खरीदी। अब तमाम सुख-सुविधाएं अंगद के घर-आंगन में हैं। अंगद और उनके पिता की प्रेरणा से जिले के सैकड़ों किसान भी केले की खेती से जुड़ रहे हैं।
70 बीघे में कर रहे केले की खेती, मिल रहा चार गुना मुनाफा
अंगद बताते हैं कि वह 70 बीघे में केले की खेती कर रहे हैं। 42 बीघे अपनी भूमि है, जबकि शेष दूसरे किसानों से ले रखी है। उनके मुताबिक, गेहूं, धान व अन्य पारंपरिक फसलों की अपेक्षा इसमें करीब चार गुना फायदा है। केले की फसल करीब 14 महीने की होती है। एक बीघे में लगभग दो लाख रुपये मिल जाते हैं। गेहूं और धान की फसलों से औसत रकम 50 से 60 हजार ही मिल पाती है।
खुद ही तैयार कर रहे पौध
अंगद पहले बाहर से पौध लाते थे। अब स्वयं तैयार करा रहे है। आज कौशाम्बी में केले की खेती हो रही है तो यह अंगद के पिता की ही देन है। अंगद का कहना है कि पहले भुसावल, गुजरात और महाराष्ट्र से पौधे लाते थे। अब साझे पर लखनऊ में फार्म बनाया है। उसी में केले की नर्सरी तैयार की जाती है। दूसरे किसानों को भी इससे फायदा मिल रहा है। यहां का केला यूपी के अलावा मध्य प्रदेश और दिल्ली तक जाता है।