दोआबा में केले की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ मजदूरों को घर बैठे रोजगार देने का काम कर रही है। खेतों में रोपाई से लेकर फलों की कटाई और फिर केले के पेड़ों को कटवाकर खेत खाली कराने तक मजदूरों की जरूरत होती है। गांव में ही रोजगार मिलने से मजदूरों को रोजी कमाने के लिए गैर जनपद पलायन नहीं करना पड़ता। ऐसे में केले की खेती से दोआबा के किसान तो मालामाल हो ही रहे हैं, मजदूरों को भी घर बैठे जीविका का अवसर मिल रहा है।
देश में मांग बढ़ने के कारण दोआबा के किसानों की केला प्रमुख फसल हो बन गई है। इससे किसानों को प्रति बीघा डेढ़ से दो लाख रुपये की आमदनी हो रही जो कोई अन्य फसल नहीं दे सकती। किसानों के लिए मुफीद साबित हुई केले की खेती ने इलाकाई मजदूरों को भी रोजी कमाने का मौका दे रही है। जुलाई में सकर्स रोपाई से लेकर साल भर फसल वाले खेतों की निराई, गुड़ाई, खाद, पानी, कीटनाशक छिड़काव आदि के लिए लगातार मजदूरों से किसान काम लेता है। इसके अलावा फूल और फल आने के बाद झुक रहे पेड़ों को सहारा देने के लिए बांस की टेक देने का काम भी मजदूर करते हैं। फल तैयार होने के बाद उन्हें पेड़ों से काटने और ट्रांसपोर्ट करने के लिए खेत से वाहनों में लादने का काम मजदूर करते हैं। ऐसे में इलाकाई मजदूरों को रोपाई से लेकर खेत खाली करने तक केले की खेती लगातार घर बैठे रोजगार मुहैया करा रही है। इससे साफ है कि केले की फसल किसानों की आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने में मुफीद साबित हो रही है।
16 हजार मजदूरों को मिला रोजगार
केले की खेती पूरी तरह से मजदूरों पर निर्भर है। एक हेक्टेयर में कराई जाने वाली केले की फसल की समय पर निराई, गुड़ाई, खाद और पानी देने के लिए आठ मजदूरों की जरूरत होती है। किसानों की माने जो वह मजदूरों से पूरे साल का करार कर लेते हैं। इसके बाद यही मजदूर उनके खेतों में लगातार काम करते रहते हैं। चालू वित्तीय वर्ष में जिले में कुल 2100 हेक्टेयर भूमि पर केले की खेती हुई है। ऐसे में लगभग 16 हजार आठ सौ मजदूरों को साल भर का रोजगार मिला है।
दोआबा में केले की खेती किसानों के अलावा मजदूरों के लिए भी मुफीद है। केले की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभाग हमेशा प्रयासरत रहता है।
पंकज शुक्ल, डीएचओ कौशाम्बी