सिराथू। इमरजेंसी को लेकर देश भर में चली कांग्रेस विरोधी लहर तीन साल के अंदर ठंडी पड़ गई थी। 1977 में चुनी गई जनता पार्टी की सरकार अंर्तविरोध के चलते 80 में गिर गई। तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने जनवरी 1980 में मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी। दोआबा से कांग्रेस ने पाला बदल कर साथ आए निवर्तमान सांसद रामनिहोर राकेश को मैदान में उतारा। रामनिहोर फिर से मैदान मारने में कामयाब हुए। इसी के साथ ही कांग्रेस को खोई हुए जमीन फिर से वापस मिल गई।
1980 में हुए सातवें लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में दोआबा की चायल (सुरक्षित) सीट से सांसद रहे रामनिहोर राकेश भारतीय लोकदल का दामन छोड़कर कांग्रेस (आई) के साथ हो लिए थे। कांग्रेस ने दल-बदलकर आए राकेश को टिकट देकर मैदान में उतार दिया। उन्हें टक्कर देने के लिए जेएनपी-एस से बिहारी लाल शैलेश, जेएनडी से सरला चौधरी, एमयूएम से भोंदाला, निर्दल प्रत्याशी के रूप में रामचंद्र, नथन लाल, वीरेंद्र कुमार, श्याम लाल आनंद स्वरूप, मणिलाल और जवाहर लाल समेत 11 उम्मीदवार चुनावी दंगल में उतरे। इस दौर तक दोआबा की जनता में इमरजेंसी से पैदा हुई नाराजगी तकरीबन खत्म हो चुकी थी।
इंदिरा ने नया नारा दिया था कि काम करने वाली सरकार चुनिए। दोआबा की जनता ने फिर से वापसी करने के लिए कांग्रेस की नाव में सवार होकर राम निहोर राकेश के पक्ष में मतदान कर दिया। चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी 91611 वोट पाकर अपने नाम जीत दर्ज कराने में कामयब रहे। दूसरे स्थान पर जेएनपी-एस के बीएल शैलेश को 79894 मत से ही संतोष करना पड़ा। इसी तरह जेएनपी प्रत्याशी सरला चौधरी 31040 मत पाकर तीसरे स्थान पर रही। जबकि रामचंद्र को 4507, नथन लाल को 3614, वीरेद्र कुमार को 3328, भालेंद्र को 2468, श्याम लाल को 2448, आनंद स्वरूप को 2439, मणी लाल को 2146 और जवाहर लाल का 2028 मत ही मिले।