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सिक्कों ने बढ़ाई दुकानदारों की मुश्किलें

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मंझनपुर। जिले में सिक्के लोगों के लिए मुसीबत बन गई है। बैंक और थोक कारोबारियों के लेने से इंकार करने से छोटे दुकानदारों के यहां महीनों से हजारों रुपये के सिक्के डंप हो गए हैं। रकम फंसने की वजह से इनका व्यापार का गणित बिगड़ रहा है। इससे परेशानी बढ़ गई है।
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आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी के कारण नकदी संकट से उबारने के लिए भारी मात्रा में एक, दो, पांच और दस के सिक्के बाजार में उतार दिए गए थे। उस वक्त वरदान बने सिक्के मौजूदा समय में अभिशाप बन गए हैं। दरअसल गिनती में लगने वाले समय और वजन के कारण बैंक ही अब इन सिक्कों को जमा करने से पहरेज कर रहा है। ऐसे में बड़े कारोबारी भी इन्हें लेने से दो इंकार कर दे रहे हैं। इससे छोटे दुकानदारों मसलन चाय-पान, सब्जी, खोमचा और परचून वालों की मुसीबत बढ़ गई है। फुटकर कारोबारियों के यहां दिनभर एक, दो, पांच और दस रुपये का सामान बिकता है। इसलिए वे चाहकर भी सिक्का लेने से इंकार नहीं कर पा रहे हैं। इन दुकानों में रोजाना की बिक्री का औसतन 20 फीसदी सिक्का आ जाता है। दूसरी तरफ थोक कारोबारियों के इंकार करने से सिक्कों का भंडार लग गया है। मंझनपुर कस्बे के किराना व्यापारी विजय केसरवानी, विष्णु मोदनवाल व चाय विक्रेता सानू आदि का कहना है कि शासन-प्रशासन को सिक्कों का हल निकाला चाहिए।

सिक्कों का लेनदेन वही व्यापारी कर रहे हैं। जिनके व्यापार में मुनाफा अधिक है। क्योंकि बाजार में सिक्का चलाने के लिए 15 फीसदी कमीशन चुकाना पड़ता है। सिराथू के एक ब्रेड व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उसका पूरा व्यापार सिक्कों पर ही निर्भर है। मजबूरी में वह सिक्का लेकर बाजार के कुछ दुकानदारों के हाथ कमीशन में देता है। छोटे सामानों की बिक्री में सिक्कों का लेनदेन करने की मजबूरी होती है। मना करने पर ग्राहक विवाद करते हैं। सिक्कों की वजह से रोजाना दो-चार लोगों से तूतू-मैंमैं होती है। वहीं लोगों का कहना है कि प्रमुख बैंकों में सिक्का जमा करने के लिए अलग से काउंटर खोले जाने की आवश्यकता है। वही एलडीएम का कहना है कि बैंकों में एक ही तरह के सिक्कों का पैकेट बनाकर जमा करने की व्यवस्था है। सिक्कों के लेनदेन में किसी तरह की आनाकानी करना भारतीय मुद्रा का अपमान है। ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए लोग नजदीक के थानों में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
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