सरसंवा के घासीपुर गांव में आरआरसी सेन्टर में लटका ताला। संवाद
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जिले की 452 ग्राम पंचायतों में स्वच्छ भारत मिशन फेस-दो के तहत बनाए गए आरआरसी (रिसोर्स रिकवरी सेंटर) की हकीकत बेहद चौंकाने वाली है। रखरखाव में लगभग 13 लाख रुपये और इन केंद्रों में तैनात महिला स्वयं सहायता समूहों के मानदेय में 27 लाख 12 हजार खर्च हुआ। कुल मिलाकर 40 लाख से अधिक हर महीना खर्च करने के बाद भी जमीनी हालात बताते हैं कि यह पैसा सिर्फ कागजों में ही काम कर रहा है।
गांवों को कचरा मुक्त बनाने के लिए स्वच्छ भारत मिशन के तहत आरआरसी की स्थापना की गई है। जहां घर-घर से उठे कचरे को वर्गीकृत कर उसका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाता है। मुख्य रूप से दो प्रकार का कचरा प्रोसेस होता है। सूखा कचरा और गीला कचरा। आरआरसी केंद्र के संचालन की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की है। पंचायत के सफाई कर्मियों के माध्यम से घर-घर जाकर कचरा एकत्र कर केंद्र में जमा करना होता है।
स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को कचरा की छंटाई और कंपोस्टिंग की जिम्मेदारी दी गई है। रिकाॅर्ड व लेखा-जोखा अपडेट करने का कार्य पंचायत सहायक व रोजगार सेवक का है। आरआरसी से प्राप्त आय ग्राम निधि में जमा की जाती है।
डीएम ने डीपीआरओ को लगाई थी फटकार
जिले के ज्यादातर सेंटरों पर हमेशा ताला लटका हुआ मिलता है। सरसवां ब्लाॅक के पुनवार गांव में बीते सप्ताह डीएम डाॅ. अमित पाल के निरीक्षण के दौरान भी आरआरसी बंद मिला था। मौके पर कोई कर्मचारी नहीं था। डीएम ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए डीपीआरओ अनिल कुमार सिंह को फटकार लगाई थी, और साफ निर्देश दिए थे कि केंद्र चालू हालत में मिलनी चाहिए।
सीडीओ का सख्त पत्र भी बेअसर
डीएम की नाराजगी के बाद सीडीओ विनोद राम त्रिपाठी ने 13 नवंबर को सख्त पत्र भेजकर डीपीआरओ को चेतावनी दी कि जनपद में निर्मित सभी आरआरसी का संचालन सुचारू रूप से कराया जाए। यदि निरीक्षण के दौरान किसी भी सेंटर में ताला बंद व संचालन नहीं पाया गया तो अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। हैरानी की बात है कि सीडीओ का पत्र भी विभागीय अफसर को जगा नहीं सका। पत्र जारी होने के कई दिन बाद भी ना तो केंद्र खुले ना ही संचालन में सुधार दिखा। इनकी तस्वीर जस की तस बनी हुई है।
सरसंवा के घासीपुर गांव में आरआरसी सेन्टर में लटका ताला। संवाद- फोटो : credit