कहीं ढह न जाए राजा जयचंद्र का ऐतिहासिक किला
900 साल पहले कड़ा में गंगा तट पर राजा ने कराया था निर्माण
देखरेख के अभाव में धसकने लगीं किले की दीवारों की ईंटें
मनोज सहगल
कड़ा। जिले के स्वर्णिम इतिहास को बयां करने वाले राजा जयचंद्र के किले की इमारत पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। देखरेख के अभाव में किले की दीवार से अब ईटें खिसककर गिरना शुरू हो गईं है। किला क्षेत्र की कमान पुरातत्व विभाग के हाथों में है। पर, मरम्मत को लेकर तनिक भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
कन्नौज के राजा जयचंद्र का राजतिलक 1170 ईसवी में हुआ था। राजा बनने के बाद उसने अपनी सैन्य शक्ति को खूब बढ़ाया और यवन साम्राज्य का खात्मा किया। खुद का साम्राज्य बढ़ने के बाद उसने सैनिकों के रुकने के लिए कड़ा में गंगा किनारे किले का निर्माण कराया। इस किले से दिल्ली तक की सुरंग बनवाई। इतिहास के पन्नों पर दर्ज इसी सुरंग से जयचंद्र की सेना दिल्ली और कड़ा आती-जाती थी। कड़ा में बने किले का अधिक हिस्सा खंडहर में तबदील हो गया है। बचे हुए चंद हिस्से को पुरातत्व विभाग ने अपने कब्जे में ले रखा है। देखरेख के अभाव में अब किला भवन की दीवार में लगी ईंटें धसकने लगी हैं। समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो इस ऐतिहासिक इमारत के जमींदोज होने में समय नहीं लगेगा। इमारत के गिरते ही यहां पर 52 बीघे में फैले जयचंद्र के किले का खंडहर ही रह जाएगा।
गद्दारी का पर्याय माना जाता है जयचंद्र
कन्नौज के राजा जयचंद्र की ख्याति बहादुर योद्धा के रूप में जरूर है पर उसे गद्दार का दर्जा दिया गया है। यहां तक कि उसके नाम का मतलब ही गद्दार समझा जाता है। इसके पीछे इतिहासकारों का कहना है कि पृथ्वीराज को पराजित करने के लिए उसने मुहम्मद गोरी को देश में आने का निमंत्रण दिया और आने के बाद कई आक्रमण कराए थे। इसका दंश कड़ा क्षेत्र के लोगों का आज भी भुगतना पड़ रहा है। उस क्षेत्र के लोगों को अक्सर लोग जयचंद्र की धरती का रहने वाला कहकर कुरेदते हैं।
चौकीदार का भी नहीं रहता कोई पता
किला परिसर व इमारत की देखरेख के लिए पुरातत्व विभाग ने अजय कुमार नाम के चौकीदार को रखा था। चौकीदार किला देखने आने वाले लोगों को गाइड करता था। तीन साल पहले वहां पर पहुंचे कुछ उच्चक्कों ने उसे किले की दीवार से नीचे धकेल दिया। घटना में वह बुरी तरह घायल हो गया। इसके बाद से चौकीदार किला परिसर में नहीं दिखता। इससे यहां आने वाले पर्यटकों को कठिनाई तो होती ही है ऐतिहासिक विरासत का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है।
ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण का अधिकार भारतीय पुरातत्व विभाग को है। पर्यटन विभाग मामले में सीधे कुछ नहीं कर सकता। ऐतिहासिक विरासत स्थलों के संरक्षण के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा था, मंजूरी नहीं मिली है।
अनुपम श्रीवास्तव, क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी