जैश-ए-मोहम्मद से संपर्क के आरोप में युवक की गिरफ्तारी के बाद कासगंज एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर है। पिछले वर्षों में भी यहां आतंकी और जासूसी से जुड़े कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनकी जांच फिर चर्चा में है।
आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सदस्य से संपर्क रखने के आरोप में किलोनी गांव निवासी शहवाज सिद्दीकी की एटीएस द्वारा गिरफ्तारी के बाद कासगंज एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर सुर्खियों में है। एटीएस उसे 18 मई को उसके गांव से पकड़ कर ले गई थी, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियां अब इस नेटवर्क के दायरे को खंगाल रही हैं।
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सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि संपर्कों का दायरा कितना व्यापक था। कहीं इसके तार अन्य व्यक्तियों या संगठनों से तो नहीं जुड़े हैं। हालांकि, यह पहला मौका नहीं है। पिछले एक दशक में कासगंज का नाम आतंकवाद और जासूसी की जांच में कई बार सामने आ चुका है।
साल 2014 : इंडियन मुजाहिदीन का सहावर कनेक्शन
साल 2014 में तमिलनाडु से इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी अशरफ को गिरफ्तार किया गया था, जिसने आगरा में रेकी की थी। जांच के दौरान उसके तार कासगंज के सहावर क्षेत्र से जुड़े मिले। राजस्थान एटीएस और खुफिया एजेंसियों ने सहावर पहुंचकर जांच की, तो पता चला कि अशरफ के पिता साबिर मूल रूप से सहावर के ही रहने वाले थे, जो बाद में राजस्थान के जोधपुर में बस गए थे।
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साल 2023 : आईएसआई के लिए जासूसी
इसके बाद साल 2023 में एक बड़ा जासूसी मामला सामने आया। यूपी एटीएस ने पटियाली क्षेत्र के जिनौल गांव निवासी शैलेश कुमार उर्फ शैलेंद्र सिंह चौहान को गिरफ्तार किया। शैलेश सोशल मीडिया के जरिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के हैंडलरों के संपर्क में था और सेना के प्रतिष्ठानों व गतिविधियों की संवेदनशील जानकारी साझा कर रहा था। उसके खिलाफ आईटी एक्ट और यूएपीए के तहत कार्रवाई की गई थी।
नदरई झाल पर भारत का नक्शा बनाकर लिखा था आईएस
जनवरी 2016 में भी कासगंज में विवाद हुआ था, जब नदरई झाल पुल की ऐतिहासिक कोठरियों पर हरे रंग से भारत का नक्शा बनाकर उस पर ''आईएस'' लिख दिया गया था। साथ ही पाकिस्तान समर्थक नारे भी लिखे गए थे। हालांकि, पुलिस ने इसे तुरंत मिटा दिया था और जांच में किसी संगठित आतंकी गतिविधि की पुष्टि नहीं हुई थी, लेकिन यह हरकत किसने की, इसका खुलासा आज तक नहीं हो सका।