फोटो 26- हरि की पौड़ी गंगा में पितरों का तर्पण करते श्रद्धालु। संवाद
सोरोंजी। तीर्थनगरी में श्राद्ध पक्ष के दूसरे दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए पहुंचे। भगवान विष्णु के तृतीय अवतार भगवान वराह की इस पावन भूमि पर तर्पण का विशेष महत्व माना गया है। भोर के साथ ही हरि की पौड़ी के घाटों पर अनुष्ठान और पितरों को याद करने का सिलसिला शुरू हो गया।
आचार्य प्राज्ञेश द्विवेदी ने बताया कि शूकरक्षेत्र सोरोंजी में पिंडदान करने से अन्य तीर्थों की अपेक्षा साठ हजार गुना अधिक फल प्राप्त होता है। यहां मुख्य रूप से कुश, तिल, जौ और चावल से तर्पण किया जाता है।
गरुण पुराण के अनुसार, कुश में देवताओं का वास होता है। इसका अग्र भाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्य का और जड़ भाग पितरों का प्रतीक है। वहीं, तिल पितरों को अत्यंत प्रिय हैं और मान्यता है कि दुष्ट आत्माओं को दूर भगाने व श्राद्ध को पूर्ण करने के लिए तिल बिखेरे जाते हैं।
धार्मिक मान्यता है कि कुश और तिल के बिना श्राद्ध पूजा अधूरी मानी जाती है। पितरों का विधि-विधान से तर्पण करने और उनके निमित्त अन्न-जल अर्पित करने से पितृ दोष की बाधाएं दूर होती हैं और जीवन के सभी संकट टल जाते हैं।
इसके अलावा, सामान्य दिनों में भी गाय को रोटी खिलाने से पितृ दोष शांत होता है। तीर्थनगरी में दूर-दराज से आ रहे श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ अपने पितरों का पिंडदान कर रहे हैं।