रोग की पहचान में मदद मिलती है
साउंड सैंपल लेने के लिए रोगी से कुछ वाक्य बोलने को कहा जाता है। वो जो जवाब देता है, उससे साउंड सैंपल तैयार किए जाते हैं। इन्हीं सैंपल से रोग की पहचान हो जाती है। ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. एसके कनौजिया ने बताया कि एआई टूल सरीखी तकनीक से रोग की पहचान में मदद मिलती है। डायग्नोसिस सटीक होती है। डॉ. हरेंद्र की देखरेख में डॉ. नेहा चौधरी ने एआई टूल पर शोध किया है।
आवाज की फ्रीक्वेंसी बता देती है दिक्कत
डॉ. हरेंद्र ने बताया कि इससे टेली मेडिसिन से इलाज में आसानी हो जाएगी। इसमें आवाज सैंपल से जांच कर ली जाएगी। वोकल कॉर्ड की बीमारी किस स्थिति में है, यह भी पता लग जाएगा। उन्होंने बताया कि गले की बीमारी होने पर आवाज की फ्रीक्वेंसी बता देती है कि कुछ दिक्कत है। डॉ. अमृता श्रीवास्तव और डॉ. नेहा ने बताया कि एआई टूल का सॉफ्टवेयर एक स्पेक्टोग्राम बना देता है।
गांठों के नेचर के संबंध में भी पता चल जाता है
इसी से बीमारी की स्थिति के बारे में पता लग जाता है। इसके अलावा गांठों के नेचर के संबंध में भी पता चल जाता है। उन्होंने बताया कि गले से संबंधित दिक्कतें बढ़ रही हैं। बहुत से रोगी दूर-दराज इलाकों के होते हैं, जिन्हें अस्पताल आने-जाने में दिक्कत होती है। टेली कंसलटेशन से कोसों दूर बैठे रोगी की आवाज का सैंपल लेकर डायग्नोसिस बन जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर एआई टूल शोध को इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के एमडी, एमएस थेसिस सपोर्ट प्रोग्राम में चयनित किया गया है।