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पढ़ने के शौकीनों के बीच लोकप्रिय सजल की 'हसरतें'

Thu, 09 Aug 2018 07:56 PM IST
गौरव शुक्ला, अमर उजाला, कानपुर
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सजल मेहरा
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कानपुर के सजल मेहरा ‘मैहर’ अपनी लेखनी से केवल हिंदी ही नहीं गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी मशहूर हो रहे हैं। सजल की 'हसरतें' पुस्तक प्रेमियों के बीच चर्चा बटोर रही है। बुक स्टोर्स के अलावा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अमेजॉन, फ्लिपकार्ट, इन्फिबीम और बुकतोपिया में 'हसरतें' उपलब्ध है।   
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‘मैहर’ बताते हैं कि मेरा जन्म कानपुर में हुआ। मेरा बचपन शहर की गलियों में ही बीता है। मैंने स्कूलिंग सर पदमपत सिंहानिया स्कूल से पूरी की। फिर जॉब लग गई और कई शहरों जैसे- दिल्ली, मुंबई, पुणे, चेन्नई में रहते हुए भी जो अपनापन कानपुरवासियों के बीच में लगता है वो कहीं और महसूस नहीं होता। मेरी कविताओं के संग्रह में सबसे पहली कविता '32 विकास नगर' है जो कि मेरे घर का पता है। एक और कविता जिसका शीर्षक है 'जे.के. की यादें' मेरे स्कूल के दिनों की यादों को ताज़ा करती है। अपने कानपूर के लिए ये मेरी भेंट है।  सजल अपने बारे में बताते हैं कि मुझे लिखने का शौक कॉलेज के दिनों से ही था लेकिन सीरियस राइटिंग मैंने हाल ही के कुछ वर्षो से ही शुरू की है। गुलज़ार की रचनाएं मुझे बहुत प्रेरित करती हैं, जावेद अख्तर साहब का भी लिखने का तरीका बेहद अलग है। 'हसरतें' में सिर्फ कविताएं नहीं बल्कि नज़्में भी मिलेंगी और मेरी नजर में नज़्म चाहे वो आज़ाद हों या नारसी इन्हे लिखने थोड़ा मुश्किल होती है और मुझे ये पसंद हैं। कॉलेज के दिनों में मैं शायरी और रोमांटिक कविताएं लिखता था इसकी एक छलक मेरी कविता 'कुछ तो हुआ था' में देखती है। इससे पाठक की कुछ बचपन की यादें भी ताजा होंगी और फिर जिंदगी के रोज़मर्रा की बातें भी हैं इसमें खूबसूरत अंदाज में पढ़ने को मिलेंगी। 'हसरतें' को चेन्नई के नोशनप्रेस द्वारा प्रकाशित किया गया है। 

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मेरी मां भी मुझसे बहुत परेशान रहती थी

विकास नगर निवासी सजल बंगलूरू की आईटी कंपनी में हैं प्रोजेक्ट मैनेजर
‘मैहर’ बताते हैं कि मैं एक बहुत ही शरारती बच्चा था और हर मां की तरह मेरी मां भी मुझसे बहुत परेशान रहती थी, एक साधारण मिडिल क्लास फॅमिली से था इसलिए प्रेशर ज़ादा था। फिर वो शरारती बच्चा उम्र के साथ पढाई भी कर गया। अच्छी नौकरी भी मिल गई और अब लेखन की दुनिया में भी कदम रख दिया है। ‘मैहर’ के अनुसार बच्चो पर ज्यादा प्रेशर न डालें उन्हें अपनी रूचि का काम करने दें। जो प्रुडक्टिविटी एक खुले दिमाग की होती है उसका कोई तोड़ नहीं और मैं आग्रह करूंगा सभी माता पिता से कि वे अपने बच्चो को आज की गैजेट दुनिया में खोने न दें। इन्हे कोई खेल से जोड़े रखें इससे न सिर्फ बच्चे की अच्छी प्रगति होती है बल्कि टीम वर्क, जीत हार का अनुभव और मेहनत करना भी आता है। ये लॉन्ग रन में आपके जीवन के लिए अति आवश्यक और लाभदायक होगा। 
 

कविता, ग़ज़ल या नज़्म इनमें अंतर है

इससे पहले ‘32 विकास नगर’ और ‘जे.के. की यादें’ भी लिख चुके हैं
इनमे कई डिफरेंस हैं...ग़ज़ल लिखने के कुछ रूल्स होते हैं जो पूरी ग़ज़ल में पाए जा सकते हैं, ग़ज़ल का हर शेर अपने में पूर्ण होता है।  इसमें बेहर, रदीफ़ और काफिया का होना बहुत ज़रूरी है। नज़्म एक अलग तरह का लेख है जिसमें पूरी नज़्म में एक कहानी होती है।  इनमे भी आज़ाद नज़्म, पाबंद नज़्म, नरसी नज़्म जैसे अलग अलग प्रकार हैं। नज़्मों में रदीफ़ का होना या न होना ज़रूरी नहीं है। कविता में स्थायी अन्तरा और समाप्ति होती है। इसलिए ये तीनो ही अलग-अलग हैं। 
 

‘मैहर’ की कविता...

पुस्तक प्रेमियों के बीच चर्चा में सजल की ‘हसरतें’
बत्तीस विकास नगर
हसरतों और ख्वाइशों को मुकम्मल जहां अब कहां,
छत्तों पे चादरें पड़े, वो ज़माना अब कहां
गिने तारों को रात भर यूंही पड़े औंधे,
सर्दियों में आग सेंकें, मूंगफलियों का ज़माना अब कहां

किताबों को पढ़े तो अरसे बीते,
कलम में स्याही डालें, वो ज़माना अब कहां
किसी गुड्डे की शादी गुड़िया से हो,
वो न्योता, वो भंडारा अब कहां

साइकिल के टायर को गोल घुमाना बीत गया
कटिया से बिजली का तार जोड़ना लद गया,
अब कहाँ होती है मौसिकी गुलेगुलज़ार से,
पतंगों से पेंच लड़ायें वो ज़माना अब कहां

बारिशों में लथपथ भीगें, चाय कुल्हड़ की अब कहां,
बन मस्के से भूख मिटायें, मठ्ठे की थैली अब कहां
वो फैमिली का टिकट ख़रीदे और बालकनी में सीट हो,
जब मां के हाथ का तकिया हो...वो ज़माना अब कहां। 


 
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जानिए सजल ‘मैहर’ के बारे में

सजल मेहरा
प्रोफाइलः- 
नामः
सजल मेहरा ‘मैहर’
authormehr@gmail.com
जन्मः 24 अगस्त 1983 
पिताः सुरेंद्र मेहरा
मांः मंजू मेहरा
शिक्षाः एमबीए 
पेशाः प्रोजेक्ट मैनेजर आईटी कंपनी 
शौकः लेखन, गायकी, मिमिक्री
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