कानपुर। अब विश्वविद्यालयों में गलती करने पर छात्रों को सिर्फ निलंबन या जुर्माने की सजा नहीं मिलेगी बल्कि उन्हें अपना आचरण सुधारने के लिए काम भी करना होगा। हाईकोर्ट के आदेश पर छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) और हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी (एचबीटीयू) में यह नई अनुशासनात्मक पद्धति लागू कर दी गई है।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) भी इसे अपनाने की तैयारी में है। नई व्यवस्था के तहत अब छात्रों को गलती करने पर बागवानी, परिसर की सफाई, पेड़-पौधों की देखभाल या समाज सेवा जैसे कार्यों को करना पड़ता है।
इसका उद्देश्य छात्रों में जिम्मेदारी और अनुशासन की भावना विकसित करना है ताकि वह अपनी गलतियों से सीखकर समाज के प्रति संवेदनशील बनें। शैक्षिक संस्थानों में यह पहल सुधार के साथ सजा की भावना पर आधारित है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह परिवर्तन उच्च शिक्षा में सकारात्मक अनुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
एचबीटीयू में हाल ही में 11 छात्रों को अनुशासनहीनता के चलते मिड सेमेस्टर परीक्षा से निष्कासित कर 15 दिन तक बागवानी करने का कार्य सौंपा गया। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि केवल दंड देने से छात्रों का सुधार संभव नहीं इसलिए ऐसी सजा दी जा रही है जिससे उनमें व्यावहारिक परिवर्तन आए।
विवि के डीएसडब्ल्यू प्रो. अलक कुमार सिंह ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस व्यवस्था को लागू किया गया है। यह कदम छात्रों को अनुशासन का महत्व समझाने और जिम्मेदारी की भाव जगाने के लिए उठाया गया है।
उन्होंने कहा कि हर तरह के मामलों में अलग-अलग तरह का समाज सेवा का कार्य दिया जाएगा। कभी बागवानी तो कभी अस्पताल में मरीजों को पट्टी करना तो कभी जूनियर्स को पढ़ाने का काम दिया जा सकता है। यह कार्य 60 दिन की अवधि तक का हो सकता है।
इससे पहले छत्रपति शाहूजी महाराज विवि में भी अनुशासनहीनता पर छात्रों को समाज सेवा का कार्य दिया गया था। विश्वविद्यालय ने भी अनुशासनात्मक मामलों में छात्रों को समाज सेवा से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की है। यहां गलती करने वाले छात्रों को विश्वविद्यालय परिसर की सफाई, पौधरोपण या रक्तदान शिविरों में सहयोग करने का कार्य दिया जाता है।
विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि इससे छात्रों में सामाजिक उत्तरदायित्व और संवेदना का विकास होगा। अब सीएसए विश्वविद्यालय भी इस पद्धति को अपनाने की तैयारी में है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें चरित्र निर्माण और समाज के प्रति कर्तव्यबोध का भी समावेश जरूरी है।