कानपुर देहात। शारदीय नवरात्र में महिलाएं आस्था के साथ अपनी जिम्मेदारियां भी बखूबी निभा रही हैं। सुबह पूजा-अर्चना और घर के कामकाज निपटाने के बाद वे व्रत रखकर स्कूल और अन्य कार्यस्थलों पर ड्यूटी कर रही हैं। यही नहीं वह भक्ति में शक्ति तलाशते हुए आने वाली पीढ़ी को संस्कार भी दे रही हैं।
मां दुर्गा की आराधना, हाथों में पूजा की थाली और मन में परिवार की सुख-समृद्धि की कामना। नवरात्र में महिलाओं की आस्था का यही स्वरूप घरों से मंदिरों तक दिखाई देता है। कोई वर्षों से व्रत की परंपरा निभा रही है, तो कोई नई पीढ़ी को धार्मिक संस्कारों से जोड़ने में जुटी है। महिलाओं के लिए नवरात्र केवल नौ दिनों की उपासना नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और पारिवारिक जुड़ाव का पर्व भी है। दशकों से व्रत रख रहीं महिलाओं का कहना है कि मां दुर्गा की पूजा-अर्चना से मन को सुकून मिलता है और सकारात्मकता का संचार होता है। वे परिवार की खुशहाली, सुख-शांति और समृद्धि के लिए विधि-विधान से पूजा करती हैं। उनके अनुसार, यह परंपरा आपसी प्रेम और विश्वास को मजबूत करने के साथ बच्चों को धर्म, आस्था और संस्कारों से जोड़ने का अवसर है।
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बोली महिलाएं...
नौकरी के साथ व्रत रखना चुनौतीपूर्ण है। सुबह पूजा और परिवार के लिए भोजन बनाने के बाद बच्चों को स्कूल भेजना होता है। इसके बाद डिपो आकर बस से लखनऊ तक का सफर और शाम को वापसी करने के बाद परिवार की देखभाल और भोजन तैयार करते हैं। इन सबके बीच मां के प्रति आस्था से यह सब कार्य करने की शक्ति मिलती है। - पूनम देवी, परिचालक, माती डिपो
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नौ दिन व्रत रखने का संकल्प लिया है। अन्न का त्याग कर फल और शाम को फलाहार करती हूं। जरूरी सामान पहले ही खरीद लिया था, ताकि बार-बार बाजार न जाना पड़े। हालांकि इन सब के बीच नौकरी करना और शाम को वापसी करने के बाद घर के काम निपटाने से थकान है लेकिन मां दुर्गा भक्ति से शक्ति मिलती है। - शिल्पी देवी, परिचालक, माती डिपो
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नवरात्र में परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हूं। मां के प्रति श्रद्धा और विश्वास से मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है। बचपन में मां के साथ व्रत रहना सीखा और आज अपने बच्चों को भी ये संस्कार दे रही हूं। यह परंपरा हमें अपने संस्कारों से जोड़े रखता है। - अनु गुप्ता, रूरा, गृहिणी