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गंगा में धो डाले 400 करोड़

Thu, 14 Jan 2016 12:42 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की तरफ से गंगा सफाई के लिए फंडिंग पर रोक से गंगा को निर्मल करने की योजना पर झटका लगा है। हालांकि मोक्षदायिनी की धारा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए 2500 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी नतीजा जीरो है।
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पतित पावनी अब भी मैली है। शहर में भी यही हाल है। यहां रोजाना सीवरेज कचरा और अन ट्रीटेड टेनरियों का पानी गिर रहा है। अकेले यहीं गंगा सफाई पर 400 करोड़ रुपये से ज्याद खर्च हो चुके हैं।

नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथारिटी (एनजीआरबीए) के समन्वयक डॉ. विनोद तारे ने बताया कि गंगा एक्शन प्लान-1 और 2 में 2500 करोड़ रुपये का बजट जारी किया गया था। यह बजट ट्रीटमेंट प्लांट बनाने, चलाने, सफाई, जागरूकता अभियान खत्म हुआ है, फिर भी नतीजा अच्छा नहीं है। सफाई अभियान जहां का तहां है। गंगा मैली की मैली ही है।
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निर्माण बंद करने की सलाह
जाजमऊ में 43 एमएलडी, बिनगवां में 210 एमएलडी, बनियापुरवा में 15 एमएलडी और सजारी, सनिगवां में 42 एमएलडी का सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जा रहा है, जिसे आईआईटी के वैज्ञानिकों ने बंद करने की सलाह दी है।

विज्ञानियों का कहना है कि पहले प्लांट चलाने, रखरखाव के लिए बजट की व्यवस्था कर ली जाए, फिर प्लांट बनाया जाए। ऐसा नहीं हुआ तो करोड़ों रुपये का बजट बेकार जाएगा। पांडु नदी पर प्रस्तावित 126 एमएलडी, बिनगवां में 115 एमएलडी के ट्रीटमेंट प्लांट को भी रोका जाना चाहिए।

7000 करोड़ रुपये का और प्रावधान
विश्वबैंक, केन्द्र सरकार ने गंगा के लिए 7000 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया है, जिसे अगले 10 सालों में खर्च किया जाना है। आईआईटी के मुताबिक गंगा एक्शन प्लान के तहत 2500 करोड़ रुपये का बजट खर्च किया जा चुका है।

वर्ष 1985 से वर्ष 2010 के बीच 1000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। वर्ष 2011 में 1500 करोड़ रुपये की दूसरी किस्त जारी की गई। गंगा सफाई अभियान से जुड़े राज्यों को बजट दिया गया। ज्यादातर बजट ट्रीटमेंट प्लांट पर खर्च हुआ, जिससे बेहतर नतीजे मिलने की उम्मीद नहीं है। जो ट्रीटमेंट प्लांट हैं, वह पूरी क्षमता से नहीं चल रहे। तमाम प्लांट बंद पड़े हैं।

एक लाख करोड़ रुपये की जरूरत
आईआईटी के विज्ञानियों के मुताबिक गंगा बेसिन की सफाई, प्रदूषण दूर करने और धारा को निर्मल, अविरल बनाए रखने के लिए अभी 1 लाख करोड़ रुपये और खर्च करने पड़ेंगे। सिर्फ 7000 करोड़ रुपये के आवंटन से काम नहीं चलेगा। हालांकि पूरी योजना के साथ बजट खर्च किया जाना चाहिए।

941 करोड़ की परियोजनाओं को झटका
फंडिंग पर रोक से गंगा को निर्मल बनाने के लिए प्रस्तावित 941 करोड़ की योजनाओं को झटका लगा है। अफसरों की मानें तो गंगा की सफाई के लिए फंड नहीं मिला तो नालों के डायवर्जन से लेकर बिठूर को चमाचम करने की परियोजनाओं का परवान चढ़ने से पहले ही फाइलों में दम घुट सकता है।

गौरतलब है कि एनजीटी ने 12 जनवरी को सुनवाई के दौरान गंगा की सफाई में लापरवाही बरतने और प्रदूषण के स्रोतों की अपुष्ट जानकारी देने पर नेशनल गंगा रिवर बेसिन अर्थारिटी (एनजीआरबीए) को गोमुख से यहां (कानपुर) तक गंगा सफाई के लिए फंड देने से रोक दिया। इससे गंगा की सफाई से संबंधित स्वीकृत योजनाओं के साथ ही प्रस्तावित योजनाएं ठप हो सकती हैं।

फैक्ट फाइल
20 नालों के माध्यम से रोजाना 544.69 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) सीवरेज कचरा गंगा में गिर रहा। 544.7 एमएलडी वेस्ट वाटर भी गंगा में समा रहा।

कन्नौज से वाराणसी के बीच लगभग 450 किलोमीटर तक गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित है। वहां से 75 फीसदी म्यूनिसिपल सीवेज और 25 फीसदी औद्योगिक कचरा गंगा में जाता है।

जाजमऊ में तीन ट्रीटमेंट प्लान बने हुए हैं। 5 एमएलडी के ट्रीटमेंट प्लांट में चार एमएलडी, 130 एमएलडी के प्लांट में 60 एमएलडी और 36 एमएलडी के प्लांट में 22-26 एमएलडी कचरा शोधित किया जा रहा है, जो मानक से कम है। तीनों ट्रीटमेंट प्लांट को बनाने में 55 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। संचालन पर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके, फिर भी रोजाना निकलने वाले 544.69 एमएलडी कचरे का शोधन नहीं हो पा रहा। रोजाना 90 एमएलडी कचरा ही शोधित किया जा रहा है।

महुआ नदी, काली नदी, रिंद नदी और पांडु नदी सूख गई हैं। इससे गंगा का बहाव कम हो गया। पानी की मिठास भी कम हुई है। पानी में कीड़े पड़ने लगे हैं। इससे हरिद्वार और कुंभ में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को दिक्कत होती है। गंगा में गिरने वाली घाघरा, राप्ती, कोसी, गंडक, गोमती और यमुना नदी का बहाव भी कम हो गया है।
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