दिहाड़ी मजदूर पिता श्रीपाल का सीना रविवार को गर्व से चौड़ा हो गया। उनके डॉक्टर बेटे को राज्यपाल राम नाईक और चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री राधेश्याम सिंह के हाथों गोल्ड मेडल मिला।
बेटे की एमसीएच प्लास्टिक सर्जरी में थीसिस को सर्वोत्तम चुना गया था। हालांकि केजीएमयू प्रशासन की वजह से श्रीपाल यह गर्व भरे पल के साक्षी नहीं बन सके क्योंकि उन्हें सांइटिफिक कन्वेंशन सेंटर के हॉल में घुसने ही नहीं दिया गया।
डॉ. प्रेम शंकर ने बताया कि माता मुन्नी देवी और पिता श्रीपाल के आशीर्वाद, मामा डॉ. पीतांबर और श्रीलाल की प्रेरणा से वेे इस मुकाम पर पहुंचे। राजधानी से 16 किलोमीटर की दूरी पर कल्ली पश्चिम गांव के रहने वाले डॉ. प्रेम शंकर का बचपन दुश्वारियों में बीता।
पिता सुबह चौराहे पर जाकर मजदूरी ढूंढ़ते तबजाकर घर के खाने का इंतजाम होता था। किसी तरह मोहनलालगंज के नवजीवन इंटर कॉलेज से हाईस्कूल किया। इंटरमीडिएट में एक बार फेल हो गया और स्कूल छोड़ दिया।
इस दौरान पिता के साथ मजदूरी भी की लेकिन कुछ बनने की जिद थी इसलिए दोबारा प्राइवेट इंटरमीडिएट की परीक्षा दी और उसमें सफलता हासिल की। इसके बाद केकेवी में 1994 में बीएससी में प्रवेश लिया।
इस दौरान इलाहाबाद में मामा डॉ. पीतांबर के निर्देशन में डॉक्टरी की तैयारी करता रहा। 1996 में कानपुर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में प्रवेश मिल गया। वहां 2001 में एमबीबीएस पास होने के बाद पीजी की तैयारी की और 2002 में एमएस जनरल सर्जरी में प्रवेश हो गया।
2005 में पहले ही प्रयास में एमएस की डिग्री हासिल कर ली। इसके बाद 2006 में कानपुर मेडिकल कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी मिल गई। 2009 में असिस्टेंट प्रोफेसर बन गया लेकिन कुछ अलग करने की इच्छा मन में दबी रही। इसीलिए सुपर स्पेशलिटी में प्रवेश की तैयारी शुरू की।
इसी के बाद 2011 में सफदरजंग में एनओसी न मिलने के कारण सीट छोड़नी पड़ी। 2012 में बीएचयू और केजीएमयू में टॉपर रहा, आल इंडिया में थर्ड रैंक मिली। इसके बाद मैंने केजीएमयू में एमसीएच प्लास्टिक सर्जरी में प्रवेश ले लिया।
2015 में एमसीएच की डिग्री गोल्ड मेडल के साथ हासिल की। डॉ. प्रेम शंकर ने बताया कि अब उनका प्रयास कानपुर मेडिकल कॉलेज में प्लास्टिक सर्जरी विभाग शुरू करने का होगा।