कानपुर के गांधीनगर इलाके की सामाजिक संस्था ने इस महाभ्रष्टाचार की परतों को खोलते हुए चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, जिसने सरकारी सिस्टम की साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। संस्था के पदाधिकारियों ने सेवानिवृत्त एआरटीओ ललित कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए केंद्रीय सतर्कता आयोग और परिवहन आयुक्त को पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाए हैं।
बिना ट्रायल 500 रुपये में पास होता था स्थायी लाइसेंस
संस्था की ओर से की गई शिकायत के मुताबिक, कोरोना काल से पहले आरटीओ में नए स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने का एक तय रेट कार्ड चलता था। उस दौरान हर दिन करीब 300 आवेदकों का स्लॉट बुक होता था। हैरानी की बात यह है कि इन 300 लोगों में से केवल 10 से 15 फीसदी लोग ही मैदान पर आकर गाड़ी चलाने का वास्तविक ट्रायल देते थे।
60 मिनट में 100 वाहनों की जांच
इस धन कुबेर की चालाकी और लापरवाही का सबसे बड़ा खेल वाहन फिटनेस के नाम पर खेला गया। संस्था के पदाधिकारियों ने दस्तावेजों के साथ आरोप लगाया है कि फिटनेस पॉइंट पर गाड़ियों की तकनीकी जांच के नाम पर महज खानापूर्ति होती थी। आरटीओ दफ्तर में सिर्फ 60 मिनट के भीतर 100 से अधिक वाहनों की जांच पूरी कर ली जाती थी।
अकूत संपत्ति देख जांच एजेंसियां भी हैरान
महज 500-500 रुपये की फुटकर रिश्वत और फिटनेस के नाम पर लाखों के इस खेल ने ललित कुमार को यूपी परिवहन विभाग का सबसे बड़ा 'धन कुबेर' बना दिया। जांच एजेंसियों द्वारा अब तक की गई कार्रवाई में उनके पास से 35 करोड़ रुपये से अधिक की चल-अचल संपत्ति और दस्तावेज बरामद हो चुके हैं।