प्रदेश में 45 हजार से अधिक उद्योग स्थापित कराकर हजारों करोड़ रुपये टैक्स के रूप में अर्जित करवाने वाला उत्तर प्रदेश वित्त निगम (यूपीएफसी) नीलामी की देहरी पर खड़ा है। इस संस्थान को इसके दुर्दिन दिखाने वालों की फेहरिस्त में कानपुर और प्रदेश की तमाम नामचीन हस्तियां शामिल हैं। संस्थान के अच्छे दिनों में दुधारू गाय की तरह इसे दूहा गया और फिर छोड़ दिया गया।
कहा जा रहा है कि कर्ज की रकम हजम करने के लिए जानबूझ कर कंपनियां बीमार घोषित कराईं गईं। प्रदेश के औद्योगिक विकास में स्वर्णिम भूमिका निभाने वाला यूपीएफसी आखिर इस हालात पर कैसे पहुंचा? इसकी पड़ताल में अमर उजाला के सामने कुछ तथ्य सामने आए जो चौंकाने वाले हैं।
दरअसल सत्ता और विपक्ष में रहे नेताओं और आईएएस लॉबी के इशारे पर इसे सालों तक लूटा गया। अफसरों, नेताओं के इशारे पर उनके चहेतों को लाखों, करोड़ों रुपये के लोन दिए गए। कुछ समय बाद वे कंपनियां बंद कर दूसरे काम धंधों में मस्त हो गए।
उनके ब्याज का बोझ यूपीएफसी पर बढ़ता गया। चूंकि यूपीएफसी खुद ब्याज पर रकम लेकर औद्योगिक विकास के लिए उद्यमियों को ऋण बांटता था। इस वजह से वह खुद कर्ज में डूबता गया। बड़ों के दबाव में यूपीएफसी के अधिकारी भी वसूली से पीछे हटते रहे और खुद भी बहती गंगा में हाथ धोते रहे।
एक्सपर्ट कमेंट...
रिकवरी फॉलोअप ठीक न होने की वजह से कर्ज बढ़ता गया। यह सब रसूखदारों की दखलंदाजी की वजह से हुआ। कंपनियां जानबूझकर अपनी देनदारियां बढ़ाकर उसे सिक घोषित करवाने का प्रयास करती थीं, ताकि लोन की रकम हजम की जा सके। बाइफर में सालों साल मामले चलते रहते थे।
इसी वजह से जितने भी सरकारी संस्थानों ने लोन दिया, उन्हें वसूली में दिक्कत आई। बाइफर में मामले लंबे समय तक खिंचने की वजह से ही अब नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है। अब कंपनी के सिक होने पर रिकवरी व अन्य विकल्पों पर छह माह के अंदर ही फैसला लिया जाता है। - सीआर सुमन, चीफ रिकवरी मैनेजर (रिटायर्ड)
केस-1
शहर के कांग्रेसी नेता मदन मोहन शुक्ल ने अपने पार्टनर गिरधारी लाल तिवारी के साथ मिलकर भरुआ सुमेरपुर में 1995 में सुशीला पल्प एंड पेपर नाम से फर्म खोली थी। यूपीएफसी से एक करोड़ 10 लाख रुपये का लोन लिया। अब इन पर मूलधन के अलावा 57 करोड़ का ब्याज बकाया है।
केस-2
प्रमुख सचिव रहे एसडी बागला के बेटे राकेश बागला ने वर्ष 1992 में यूपीएफसी से एक करोड़ 20 लाख का लोन लिया। उरई में अल्फा स्प्रिंग नाम से फर्म खोली। प्रमुख सचिव के बेटे से भला कौन कर्मचारी वसूली कर पाता। बाद में फर्म बीमार घोषित हो गई। इन पर अब 70.55 करोड़ का सिर्फ ब्याज चढ़ा है।
केस-3
शहर की रोमन कांक्रीट नाम की फर्म ने वर्ष 1990 में 85 लाख का लोन लिया था। बाद में मायावती शासन के सबसे मजबूत आईएएस से फर्म के मालिक के रिश्ते अच्छे हो गए। इसके बाद से ही इनकी वसूली पर रोक लग गई। ब्याज बढ़ते हुए 60 करोड़ हो गया। फर्म सिक घोषित करके मालिक दूसरा काम करने लगा।
केस-4
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व कैबिनेट मंत्री रहे धनीराम वर्मा ने अपने बेटे महेश वर्मा को 50 लाख रुपये से अधिक का लोन दिलवाया। औरैया में जय मां संतोषी नाम से राइस मिल खोली। लोन की रकम बढ़ने पर इसे बंद कर दिया गया। कद बड़ा होने की वजह से यूपीएफसी के कर्मचारी इनसे वसूली नहीं कर सके। इन पर अब 11 करोड़ का कर्ज है।