पंचायतों में महिलाओं को अधिकार और आरक्षण तो मिला पर काम करने की आजादी नहीं। गांव की सरकार में अधिकतर महिला जन प्रतिनिधियों की बागडोर उनके परिवार के पुरुषों के हाथ में रहती है। न तो उन्हें फैसले लेने की आजादी होती है, न ही दफ्तरों तक पहुंच।
श्वेता ने लतीफपुर को बनाया पहली डिजिटल पंचायत
लखनऊ जिले के माल ब्लॉक के लतीफपुर गांव को आदर्श ग्राम पंचायत के साथ ही देश को पहली डिजिटल पंचायत बनाने वाली श्वेता सिंह ने शादी के बाद पहली बार गांव देखा था। एमसीए डिग्री धारक श्वेता ने प्रधान बनने के बाद 200-300 महिलाओं को समूहों से जोड़ा। गांव की डिजिटल मैपिंग कराई। हमारे काम की वजह से लतीफपुर को मुख्यमंत्री पंचायत प्रोत्साहन पुरस्कार समेत कई अवार्ड मिल चुके हैं।
ज्योति ने विकास कार्यों से बढ़ाई पंचायत की आय
बुंदेलखंड की सूखी घरती पर विकास के फूल उगाने वाली ललितपुर जिले की पवा ग्राम पंचायत की निवर्तमान प्रधान ज्योति मिश्रा ने काफी अच्छा काम किया। उन्होंने ग्राम सभा में बाजार की स्थापना कराई। बस स्टैंड बनवाने से पंचायत की आमदनी बढ़ी है। उनके प्रयासों से पंचायत को प्रति माह करीब 60 हजार रुपये आमदनी हो रही है। उनकी पंचायत को दीनदयाल उपाध्याय पुरस्कार, रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार मिले हैं।
प्रकाशिनी ने किशोरी साइकिल बैंक बनाया
बाराबांकी को चंदवारा ग्राम पंचायत की प्रकाशिनी जायसवाल ने अपने गांव में वाईफाई लगाने के साथ ही लड़कियों के लिए किशोरी साइकिल बैंक बनाया। चंदवारा को तीन बार दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तीकरण पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।