प्रतिवर्ष प्रतिमा की रंगाई पुताई होती है। ग्रामीण बताते हैं की गांव में कभी रावण दहन नहीं होता। इसके पीछे तर्क देते हैं कि रावण महाविद्वान थे। अंतिम समय में भगवान राम के कहने पर भ्राता लक्ष्मण ने रावण के चरणों के पास खड़े होकर ज्ञान लिया था। मान्यता है कि जिस विद्वान से खुद भगवान ने ज्ञान लिया उनके पुतले को जलाने का इंसान को क्या अधिकार है।
दशहरे में होता है रावण का श्रंगार
रावण की प्रतिमा स्थापित होने से इस मोहल्ले को रावण पटी कहते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि दशहरे पर रावण की प्रतिमा को रंग रोगन कर सजाया जाता है। साज श्रंगार के बाद ग्रामीण श्रद्धा से नारियल चढ़ाते हैं। विजयदशमी का पर्व असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाते हैं, पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। नवदंपतियों के रावण की प्रतिमा के सामने नतमस्तक होकर आशीर्वाद लेने की भी परंपरा है।
रामलीला मंचन में भी नहीं जलता पुतला
रावण की प्रतिमा के सामने मंदिर व रामलीला मैदान है। जहां जनवरी में मेला व रामलीला का आयोजन होता है। करीब एक सप्ताह तक चलने वाली रामलीला में रावण वध का मंचन होता है। इसके बाद भी पुतले को नहीं जलाया जाता। रामलीला कलाकार प्रतीकात्मक रूप में रावण वध करते हैं, पर पुतले का दहन नहीं होता। ग्रामीण रावण की प्रतिमा पर नारियल चढ़ा कर सुख समृद्धि की कामना करते हैं।