संसद में जारी हंगामे को लेकर अपनी बात दोहराते हुए यूपी के गवर्नर राम नाईक ने कहा संसद चर्चा के लिए है, न की हंगामा करने के लिए। अभी की स्थिति बिल्कुल भी व्यवहारिक नहीं लगती। उन्होंने कहा संसद का अधिवेशन समाप्त हुआ लेकिन नोटंबंदी को लेकर कोई चर्चा ही नहीं हुई। मैं ऐसा मानता हूं, संसद चर्चा के लिए होती है। सरकार और विपक्ष अपनी-अपनी बात कहे। शनिवार को नाईक ने बांदा के कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत के दौरान यह बातें कही।
'इंदिरा गांधी में नोट बंदी का फैसला लेने का साहस नहीं था' इस सवाल का जवाब देते हुए नाईक ने कहा 'नोट बंदी एक राजनीति विषय बन गया है। मैं इस विषय पर केवल इतना ही कहूंगा कि नोटबंदी के इस निर्णय से देश में कालाधन पर रोक लगी है। साथ ही साथ विदेश से बड़े पैमाने पर जो झूठे नोट आ रहे थे उस पर भी इस फैसला से करारा प्रहार हुआ है। नाईक ने कहा मैं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी भी रहा हूं। इसी पैमाने पर मैं यह बात कह रहा हूं।'
उधर नाईक ने नोटबंदी से जनता को हो रही तकलीफ का भी जिक्र किया। वे बोले आम आदमी को फैसले से तकलीफ भी हो रही है लेकिन यह तकलीफ दूर करने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार इसमें जरूर सफल होगी। मुझे लगता है यह तकलीफ कुछ समय में दूर हो जाएगी।
आगे जोड़ते हुए वे बोले, कल ही संसद का अधिवेशन समाप्त हुआ लेकिन इस विषय पर कोई चर्चा नहीं हुई। मैं ऐसा मानता हूं, संसद चर्चा के लिए होती है। सरकार अपनी बात कहे और विपक्ष अपनी बात कहें। उन्होंने कहा पार्लियामेंट्री सिस्टी में एक बहुत सुंदर वाक्य है जिसकी पहली पहली पंक्ति कहती है 'अोपोजिशन शुड हेव इट्स से' मतलब, जो विपक्ष में है उन्हें बोलने का अधिकार होना चाहिए। वहीं दूसरी पंक्ति कहती है 'द गवरमेंट शुड हेव इट्स वे' यानी जो बहुमत में है उसे कार्य करने का रास्ता होना चाहिए। अगर यह बात व्यवहार में आ जाती है तो बहुत सही रहता है।