त्वचा का रिजेक्शन नहीं होता, ब्लड ग्रुप की भी दिक्कत नहीं
डॉ. प्रेमशंकर ने बताया कि पार्थिव देह की त्वचा की पतली पर्त इपी डर्मिस, डर्मिस निकाली जाती है। यह ड्रेसिंग मैटीरियल की तरह काम करती है। इससे किसी तरह के रिजेक्शन की दिक्कत नहीं होती है। किसी भी ब्लड ग्रुप के पार्थिव शरीर की त्वचा किसी को लगाई जा सकती है। बर्न रोगियों के जख्मों पर त्वचा न होने से शरीर का फ्लुइड निकलता रहता है। इसमें प्रोटीन भी निकल जाता है। त्वचा की पर्त लगाने से द्रव्य बाहर नहीं निकल पाता। जख्म भरने लगता है। दो सप्ताह में रोगी की अपनी त्वचा बनने लगती है और ऊपर से ड्रेसिंग मैटीरियल के रूप में लगाई गई दान की त्वचा पपड़ी बनकर निकल जाती है। ऊपर से लगाई गई त्वचा दो सप्ताह तक जिंदा रहती है। देहदानी के निधन के आठ घंटे के अंदर त्वचा की पर्त निकाल ली जाती है।
क्या होता है स्किन बैंक
स्किन बैंक भी ब्लड बैंक की तरह होता है। यहां त्वचा को एक शीशी में भरकर मानइस तापमान में रखा जाता है। बैंक में तीन से पांच साल तक त्वचा सुरक्षित रखी जा सकती है। रखने से पहले त्वचा में संक्रमण आदि की भी जांच की जाती है।
स्किन बैंक का काम जल्द शुरू किया जाएगा। त्वचा की पर्त लगाने से बर्न रोगियों के जख्मों में संक्रमण नहीं होता है। इसके अलावा फ्लूइड नहीं निकलता। दो सप्ताह में रोगियों को ड्रेसिंग पर लाखों का खर्च आता है। त्वचा की पर्त लगाने से खर्च में भी बचत होगी। -डॉ. संजय काला, प्राचार्य, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज
17 अगस्त को जयपुर में हुए अंगदान, देहदान सेमिनार में प्रदेश से मैंने प्रतिनिधित्व किया था। जयपुर में स्किन बैंक चल रहा है। उसी तरह के स्किन बैंक प्रदेश के चिकित्सा संस्थानों में खोले जाने की जरूरत है। इस संबंध में जीएसवीएम के प्राचार्य डॉ. संजय काला से भी बात की। मुख्यमंत्री को भी पत्र भेजा है। देहदान और नेत्रदान के साथ त्वचा दान भी कराया जाएगा। -मनोज सेंगर, प्रमुख युग दधीचि देहदान संस्थान