विधान सभा चुनाव के मतदान में बुंदेलखंड के मतदाताओं ने अपने रुख और रवैए में कुछ खास बदलाव नहीं किया। तमाम बुनियादी समस्याओं और मुद्दों को भुला दिया और पुराने ढर्रे पर जातिगत समीकरणों को तरजीह देते हुए वोट डाले। नतीजे में लगभग सभी जातियों के वोटों में बिखराव रहा। सबसे ज्यादा वोटों का बंटवारा पिछड़ी जातियों में हुआ।
जातिगत गणित के आधार पर बुंदेलखंड में हमेशा चुनाव हुए हैं। अबकी भी यही हुआ। मतदान के बाद मतदाताओं की नब्ज टटोलने पर मिले रुझान में कहीं भी स्थानीय या देश-प्रदेश स्तरीय मुद्दों पर वोट नहीं डाले गए। सवर्ण, मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं ने मतदान में पार्टी और प्रत्याशी के आधार पर जाति को महत्व देते हुए वोटिंग की। ज्यादातर दलित अपने पुराने ढर्रे पर बसपा के पक्ष में खड़े नजर आए। मुस्लिम मतदाता बसपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन में बंट गए। पिछड़ी जातियों में कई जातियां भाजपा के पाले में आईं तो कई ने बसपा और गठबंधन का दामन थामा।
कुल मिलाकर बुंदेलखंड में अधिकांश सीटों पर कांटे की टक्कर मानी जा रही है। त्रिकोणीय मुकाबले के चलते जीत का सेहरा भाजपा, बसपा और गठबंधन प्रत्याशियों के सिर ही बंधना तय है। अन्य दलों के प्रत्याशी कहीं मुकाबले में नजर नहीं आए।
ऊपरी तौर पर आशावान, अंदर से हैरान
बांदा। मतदाताओं के रुख ने प्रमुख राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को काफी हैरान कर दिया है। भले ही वह ऊपरी तौर पर अपने पक्ष में ज्यादा मतदान मान रहे हों पर दिलोदिमाग में खौफ समाया हुआ है कि पता नहीं ऊंट किस करवट बैठे? भाजपा, बसपा और गठबंधन नेता, कार्यकर्ता और समर्थक अपनी-अपनी जीत के प्रति उम्मीदों से लबरेज नजर आ रहे हैं। मतगणना 11 मार्च को होनी है। इस बीच 15 दिन बेहद बेचैनी और कयासबाजी से भरपूर रहेंगे।