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हिन्दी दिवसः जानें, इन 5 लेखकों के बारे में अनसुनी बातें

Fri, 15 Sep 2017 07:18 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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आज हिंदी दिवस है।' हिंदी दिवस' पर  हिन्दुस्तानी भाषा की विशेषता की बात करें तो ये भाषा एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्द का प्रयोग अधिक होता है और अरबी-फ़ारसी और संस्कृत से तद्भव शब्द कम हैं। हिंदी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। चीनी तथा अंग्रेजी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है। विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है।
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हिन्दी दिवसः 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से हिंदी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया।राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।
वर्ष 1918 में गांधी जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था।

हिंदी दिवस के अवसर पर जानें, इन 5 लेखकों के बारे में अनसुनी बातें...............

गोपाल दास सक्सेना ‘नीरज’

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गोपाल दास सक्सेना ‘नीरज’ का जन्म 4 जनवरी 1925 को ग्राम पुरावली, जिला इटावा उत्तर प्रदेश में हुआ था।जिन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी काव्यानुभूति तथा सरल भाषा द्वारा हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया है और बच्चन जी के बाद नयी पीढी को सर्वाधिक प्रभावित किया है। नीरज जी से हिन्दी संसार अच्छी तरह परिचित है। जन समाज की दृष्टि में वह मानव प्रेम के अन्यतम गायक हैं। 'भदन्त आनन्द कौसल्यानन' के शब्दों में उनमें हिन्दी का अश्वघोष बनने की क्षमता है।दिनकर जी ने उन्हे हिन्दी की वीणा कहा है। अन्य भाषा-भाषियों के विचार में वे 'सन्त-कवि' हैं और कुछ आलोचक उन्हें 'निराश-मृत्युवादी' मानते हैं। आज अनेक गीतकारों के कण्ठ में उन्हीं की अनुगूँज है।

कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को बंबई फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में नई उमर की नई फसल के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फिल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वह बम्बई में रहकर फिल्मों के लिये गीत लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली, प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा। नीरज ने कानपुर से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था लेकिन हार गए।  

शिवराज भूषण

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भूषण के वास्तविक नाम का ठीक पता नहीं चलता। शिवराज भूषण ग्रंथ के निम्न दोहे के अनुसार 'भूषण' उनकी उपाधि है जो उन्हें चित्रकूट के राज हृदयराम के पुत्र रुद्रशाह ने दी थी - कुल सुलंकि चित्रकूट-पति साहस सील-समुद्र। कवि भूषण पदवी दई, हृदय राम सुत रुद्र॥ पन्ना नरेश छत्रसाल से भी भूषण का संबंध रहा। वास्तव में भूषण केवल ।शिवाजी और छत्रसाल इन दो राजाओं के ही सच्चे प्रशंसक थे। उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया है- और राव राजा एक मन में न ल्याऊं अब। साहू को सराहों कै सराहौं छत्रसाल को॥ आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार भूषण का जन्म संवत 1670 तदनुसार ईस्वी 1613 में हुआ। उनका जन्म स्थान कानपुर जिले में तिकवांपुर नाम(वर्तमान में टिकमापुर ) का ग्राम बताया जाता है। उनके पिता का नाम 'रतिनाथ' या रत्नाकर त्रिपाठी था। वे काव्यकुब्ज ब्राह्मण थे। इनके छोटे भाई थे चिंतामणि और मतिराम। भूषण के वास्तविक नाम का ठीक पता नहीं चलता। शिवराज भूषण ग्रंथ के निम्न दोहे के अनुसार 'भूषण' उनकी उपाधि है जो उन्हें चित्रकूट के राज हृदयराम के पुत्र रुद्रशाह ने दी थी। 
 शिवाजी की वीरता के विषय में भूषण लिखते हैं- 
भूषण भनत महावरि बलकन लाग्यो सारी पातसाही के उड़ाय गये जियरे।
तमके के लाल मुख सिवा को निरखि भये स्याह मुख नौरंग सिपाह मुख पियरे॥

महादेवी वर्मा

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महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च सन् 1907 को  प्रात: 8 बजे फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश के एक संपन्न परिवार में हुआ। महादेवी वर्मा रहस्यवाद और छायावाद की कवयित्री थीं, अतः उनके काव्य में आत्मा-परमात्मा के मिलन विरह तथा प्रकृति के व्यापारों की छाया स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है।

वेदना और पीड़ा महादेवी जी की कविता के प्राण रहे। उनका समस्त काव्य वेदनामय है। उन्हें निराशावाद अथवा पीड़ावाद की कवयित्री कहा गया है। वे स्वयं लिखती हैं, दुःख मेरे निकट जीवन का ऐसा काव्य है, जिसमें सारे संसार को एक सूत्र में बाँध रखने की क्षमता है। इनकी कविताओं में सीमा के बंधन में पड़ी असीम चेतना का क्रंदन है। 

वह अश्रुमयी देवी वर्मा,
हँसना न कभी जिसने सीखा, पीड़ा की गायक यह प्रतिमा|
माताजी हेमवती देवी, पति श्री नारायण सिंह वर्मा ||
जन्मीं थीं फर्रुखाबाद बीच कवियत्री महादेवी वर्मा|
'नीरमा','रश्मि','सांध्यगीत','दीपशिखा' की वे लड़ियाँ|
भावनात्मक गीतमयी शैली में 'यामा'की कड़ियाँ ||
करुणा में छायावाद लिये, अधरों में बंद विराग लिये |
प्रथ्वी पर कवियों की महिमा|
यह अश्रुमयी देवी वर्मा ||​
 

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक चर्चित साहित्यकारों मे से एक सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का जन्म बंगाल की रियासत महिषादल (जिला मेदिनीपुर) में 21 फरवरी 1896 में हुआ था। उनकी कहानी संग्रह लिली में उनकी जन्मतिथि यही तिथि अंकित की गई है। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। थी उनका जन्म रविवार को हुआ था इसलिए सूर्यकुमार कहलाए। उनके पिता पंण्डित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक गांव के निवासी थे।
ये है निराला की मशहूर कविता...
जैसे हम हैं वैसे ही रहें, 
लिये हाथ एक दूसरे का, अतिशय सुख के सागर में बहें।
मुदें पलक, केवल देखें उर में, सुनें सब कथा परिमल-सुर में। 
जो चाहें, कहें वे, कहें, वहाँ एक दृष्टि से अशेष प्रणय। 
देख रहा है जग को निर्भय, दोनों उसकी दृढ़ लहरें सहें।   उपन्यास:- अप्सरा, अलका, प्रभावती 1946, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर, बकहिरा कहानी संग्रह- लिली, चतुरी चमारर शुकुल की बीवी 1941सखी, देवी।
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अटल बिहारी वाजपेयी

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अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर, मध्यप्रदेश में हुआ। फिलहाल अटलजी स्वास्थ्य खराब होने के कारण सक्रिय राजनीति से अलग हैं लेकिन प्रधानमंत्री रहते उनके किए काम अक्सर चर्चा के केंद्र में रहते हैं। उन्होंने कानपुर के डी०ए०वी० कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। लोकप्रिय जननायक और कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ ये एक अत्यंत सक्षम और संवेदनशील कवि, लेखक और पत्रकार भी रहे हैं।  कर्तव्य के पुनीत पथ को 
हमने स्वेद से सींचा है, 
कभी-कभी अपने अश्रु और— 
प्राणों का अर्ध्य भी दिया है। 

किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में— 
हम कभी रुके नहीं हैं। 
किसी चुनौती के सम्मुख 
कभी झुके नहीं हैं। 

आज, 
जब कि राष्ट्र-जीवन की 
समस्त निधियाँ, 
दाँव पर लगी हैं, 
और, 
एक घनीभूत अंधेरा— 
हमारे जीवन के 
सारे आलोक को 
निगल लेना चाहता है; 
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