13 दिन बाद दर्ज हुई थी प्राथमिकी
पीड़िता के अनुसार पुलिस से कार्रवाई नहीं होने के बाद उच्चाधिकारियों से शिकायत की गई। इसके बाद घटना के 13 दिन बाद प्राथमिकी दर्ज की गई थी। सुनवाई के दौरान अभियुक्तों के अधिवक्ता ने प्राथमिकी दर्ज होने में हुई देरी को आधार बनाते हुए मामले को मनगढ़ंत बताया।
न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया। विशेष न्यायाधीश ने माना कि वर्ष 2006 में ग्रामीण क्षेत्र की युवती के लिए घटना के तत्काल बाद पुलिस थाने पहुंचकर प्राथमिकी दर्ज कराना सामाजिक परिस्थितियों, लोक-लाज और अन्य कठिनाइयों के कारण आसान नहीं था। इसलिए प्राथमिकी दर्ज होने में हुई देरी को मामले के खिलाफ आधार नहीं माना जा सकता।
आठ गवाह और नौ अभिलेखीय साक्ष्य पेश किए गए
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से आठ गवाह पेश किए गए। इसके अलावा नौ अभिलेखीय साक्ष्य भी न्यायालय के समक्ष रखे गए। दोनों पक्षों के तर्क सुनने और पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद विशेष न्यायाधीश ने दोनों अभियुक्तों को दोषी माना। अदालत ने दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए 35 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। न्यायालय ने जुर्माने की राशि पीड़िता को दिए जाने का आदेश भी दिया है।