कानपुर के ब्राह्मण और मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में भाजपा-सपा के बीच संग्राम देखने को मिल रहा है। प्रत्याशी ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल करने के लिए सभी गणित लगा रहे हैं।
घाटमपुर में अभी तस्वीर धुंधली
भाजपा ने दो बार (1996, 1998) की सांसद कमलरानी वरुण को चुनाव मैदान में उतारकर घाटमपुर की लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है। वह घाटमपुर (अब अकबरपुर) लोकसभा क्षेत्र से भी सांसद रह चुकी हैं। वह कानपुर नगर निगम की पार्षद भी रह चुकी हैं। अब विधानसभा का चुनाव लड़ रही हैं। बसपा ने सरोज कुरील को प्रत्याशी बनाया है। वर्ष 2012 का चुनाव सरोज मजबूती से लड़ीं और करीब 600 वोटों के अंतर से हारी थीं। हालांकि सपा और कांग्रेस के पत्ते अभी तक नहीं खुले हैं। इस कारण विधानसभा क्षेत्र की पूरी तस्वीर साफ नहीं है।
बिल्हौर में त्रिकोणीय मुकाबला
भाजपा प्रत्याशी भगवती सागर के नाम के एलान के बाद बिल्हौर (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र की लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है। इस क्षेत्र से दो पूर्व केंद्रीय मंत्री (सपा के शिव कुमार बेरिया और 2007 की बसपा सरकार में मंत्री रहे अब भाजपा नेता भगवती सागर) चुनाव मैदान में हैं। इनकी प्रतिष्ठा दांव पर है। बसपा ने कमलेश चंद्र दिवाकर को प्रत्याशी बनाया है। वह 2007 का विधानसभा चुनाव जीते थे लेकिन 2012 का चुनाव हार गए। बिल्हौर विधानसभा से वर्ष 2012 का चुनाव सपा की अरुणा कोरी ने जीता था लेकिन इस बार वह रसूलाबाद से चुनाव लड़ रही हैं। रसूलाबाद से विधायक और सपा सरकार के पूर्व शिव कुमार बेरिया को अब बिल्हौर विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया गया है। कांग्रेस का प्रत्याशी चुनाव मैदान में आए, यह संभावना कम है। वोटरों ( 374412) के लिहाज से यह दूसरी सबसे बड़ी विधानसभा क्षेत्र है। सबसे ज्यादा 86 हजार दलित वोटर हैं। इसलिए सभी पार्टियों की मंशा दलित वोटरों को रिझाने की है। ब्राह्मण 50 हजार, कुर्मी 40 हजार, यादव 30 हजार, मुस्लिम 33 हजार, क्षत्रिय 18 हजार, कुशवाहा 16 हजार सहित अन्य जातियां हैं। हर प्रत्याशी ओबीसी, दलित, सवर्ण और मुस्लिमों का समर्थन हासिल करके जीत हासिल करने की कोशिश में लगा है।
कल्याणपुर में किसका होगा कल्याण
सवर्ण, दलित और पिछड़ा वर्ग बहुल कल्याणपुर सीट पर सबसे ज्यादा बार विधायक रहीं प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार पर भाजपा ने दांव लगाया है। कांग्रेस के सपा के साथ गठबंधन करने के बाद अब यहां मुकाबला त्रिकोणीय रह गया है। हर बार की तरह इस बार भी सवर्ण, पिछड़ा वर्ग और दलित वोटों का रुझान हार-जीत तय करेगा। विधानसभा में करीब सवा लाख सवर्ण और दलित-पिछड़ा वर्ग के भी इतने ही वोटर हैं। इसके अलावा करीब 29 हजार कायस्थ मतदाता भी हार-जीत के अंतर को काफी हद तक प्रभावित करते हैं। इस सपा-कांग्रेस संयुक्त रूप से मैदान में हैं। इस कारण 18 हजार मुस्लिम मतदाताओं का वोट भी निर्णायक साबित हो सकता है।
सीसामऊ में मुस्लिमों की भूमिका महत्वपूर्ण
38 साल बाद 2012 में परिसीमन केबाद सीसामऊ विधानसभा में कई नए क्षेत्र जुटे और कटे, लेकिन जीत-हार में मुस्लिम वोटरों की भूमिका निर्णायक बनी रही। वर्तमान में यहां मुस्लिम वोटर करीब 75 हजार, दलित 33 हजार और ब्राह्मण 60 हजार हैं। सभी मुख्य पार्टियों ने इसी जतिगत गणित को आधार बनाकर प्रत्याशी उतारे हैं। मुस्लिम वोटों को ध्यान में रखकर सपा ने पिछली बार के विजेता विधायक इरफान सोलंकी को, दलित वोटों के लिहाज से बसपा ने नंदलाल कोरी तो भाजपा ने ब्राह्मण वोटों के लिए सुरेश अवस्थी को टिकट दिया है। 2012 के विधानसभा चुनाव में सोलंकी को 56, 496 वोट मिले थे। उनके निकटतम प्रतिद्वंदी रहे भाजपा के हनुमान मिश्र को 36, 833 वोट मिले थे। 19633 वोटों के ठीकठाक अंतर को पाटने की बड़ी चुनौती भाजपा प्रत्याशी पर होगी। कांग्रेस-सपा के एकसाथ होने से यह चुनौती और बड़ी हो गई है।