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छत्तीसगढ़ के मोहम्मद फैज से राम मंदिर निर्माण के लिए मिट्टी लेने का का विरोध करने वाले जरा यह पढ़ लें...

Tue, 04 Aug 2020 11:03 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा शांतनु त्रिपाठी , अमर उजाला, कानपुर
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राम मंदिर का प्रस्तावित मॉडल। - फोटो : amar ujala
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प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण में छत्तीसगढ़ से मिट्टी लेकर चले मोहम्मद फैज का विरोध करने वाले जरा मुंशी रहमान खां के बारे में भी जान लें। वह मुंशी रहमान खां, जो प्रभु राम के अनन्य भक्त थे और जिन्होंने सूरीनाम तक राम नाम जपा। यही नहीं, वहां रहे हिंदुस्तानियों को श्रीराम की महिमा से अवगत कराया। मध्यकाल यानी सैकड़ों बरस पहले अफगानिस्तान से एक पठान परिवार आकर हमीरपुर के भरखरी गांव में बस गया था।
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वर्ष-1874 में इसी परिवार के मोहम्मद खां के यहां एक बालक ने जन्म लिया। नाम रखा गया रहमान। तब यह हिंदू-मुस्लिम वाले मसले नहीं होते थे, 1857 की
क्रांति के बाद देश में सिर्फ आजादी की ही बात होती थी। मुंशी रहमान खां ने अपनी आत्मकथा ‘जीवन प्रकाश’ में लिखा है कि घुमक्कड़ी उनके नक्षत्रों में थी। पिता ने एक ज्योतिषी से कुंडली बनवाई थी, तो उन्होंने पहले ही बता दिया था कि यह बालक बहुत दूर तक जाएगा।

कानपुर के दशहरे ने पहुंचा दिया सूरीनाम
रहमान खां ने लिखा है कि घुमक्कड़ी के लिए कानपुर उनकी सबसे पसंदीदा जगह थी। चूंकि राम नाम तो उनके हृदय में ही बसा था, तो रामलीला और दशहरा मेला देखने कानपुर जरूर आते थे। 14 अक्तूबर 1898 को दशहरा मेला देखने के लिए वह दो दिन पहले ही कानपुर आ गए। मेले में ही उन्हें दो आदमी मिले, जिन्होंने उन्हें 24 रुपये मासिक पर सूरीनाम में नौकरी देने की बात कही।
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नौकरी के बारे में पूछा, तो उन्होंने बता दिया कि मजदूरों का सरदार (सुपरवाइजर) बनना है। नौकरी आकर्षक लगी, तो एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर कानपुर से वाया कलकत्ता (अब कोलकाता) चल पड़े सूरीनाम। हालांकि, पानी के जहाज में ही यह अहसास हो गया था कि गोरों का जुल्म सहना पड़ेगा। हुआ भी वही, सरदार नहीं, वहां मजदूर बना दिया गया। जमकर मजदूरी कराई गई, लेकिन ईश्वर में आस्था ने साथ दिया और मजदूरों की सरदारी मिल गई।

पंडित जी भी कहते थे मजदूर
रहमान खां सूरीनाम में शाम को दो काम करते थे। पहला हिंदी में डायरी लिखना और दूसरा हिंदुस्तानी मजदूरों को अर्थ सहित रामचरितमानस की चौपाइयां सुनाना। इसी कारण कई मजदूर उन्हें पंडित जी भी कहते थे। मुंशी रहमान खां को हिंदी, उर्दू , फारसी भाषाएं बखूबी आती थीं। वह जितनी अच्छी व्याख्या चौपाइयों की करते थे, उतनी ही हदीस और इस्लाम की भी, लेकिन शाम की चौपाल हिंदू मजदूरों के नाम ही थी।

नीदरलैंड की महारानी ने किया सम्मानित
एग्रीमेंट के मुताबिक पांच साल मजदूरी करने के बाद वह भारत लौट सकते थे, लेकिन उन्होंने वहीं बसने का फैसला लिया। उन्होंने राजधानी पारामारिबो में घर लिया और वहीं शादी कर गृहस्थी बसा ली। खेती के लिए कुछ जमीन भी खरीद ली। इसके बाद वह कई भूमिकाओं के मालिक हो गए। वह मजदूरों के सरदार भी थे, किसान भी, हिंदुस्तानियों के नेता और वहां के पहले हिंदी साहित्यकार भी।

उस समय सूरीनाम डच कॉलोनी था, तो उनके कृतित्व से प्रभावित होकर  नीदरलैंड की महारानी ने उन्हें दो बार स्वर्ण पदक से सम्मानित किया। मुंशी रहमान खां की आत्मकथा ‘जीवन प्रकाश’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ एन इंडियन इंडेंचर्ड लेबरर : मुंशी रहमान खां’ नाम से हुआ है।

 
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मुंशी रहमान खां की कुछ रचनाएं

रावण कुंभकरण भट भारी, कंसादिक रहे अत्याचारी, तिन कहं मार गरद कर डारी, नाश कीन्ह उन कर अभिमाना। बलि को तुम पाताल पठायो, हिरनाकुश को गर्व नशायो, कृपा कीन्ह प्रहलाद बचायो, जपत अखंड नाम भगवाना।। जयति जयति जय कृपानिधाना।।
 
डूबत तुम गजराज बचायो, चीर द्रोपदी केर बढा़यो, रंक सुदामा नृपति बनायो, दीन्हें कंचन महल खजाना। कीर पढ़ावति गणिका तारयो, अजामिल से खल बहु उद्धार्यो, दुष्ट ताड़का को तुम मार्यो, धनु पर साध बिना फर बाना।। जयति जयति जय कृपानिधाना।।

नेति नेति कहि वेद पुकारैं, शेष शारदा यश कहि हारैं, कोटिन बरस मुनी तन जारैं, मरम तोर तिनहूं नहीं जाना। मैं मतिमंद कहूं केहि भांती, कबहुं न यश कहि जीभ अघाती, नाम तुम्हार जुड़ावति छाती, प्रेम सहित सुमिरै रहमाना।। जयति जयति जय कृपानिधाना।।


गुरु चरनन सिर नाई, ईश गुण गाई।। टेक नारि अहिल्या रही अध लीन्हें सिला शरीर धराई। धूरि चरन रघुनाथ की छूकर हो, गई स्वर्ग हर्षाई।। ईश गुण गाई।।

नहिं रसना गुण गाऊं तोरे शारद शेष थकाई। नीक सीख ‘खान’ यह देवैं हो, रटहु हृदय रघुराई।। ईश गुण गाई।।

हसरत के कृष्ण-कृष्ण
हसरत मोहानी भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। शायद ही कोई ऐसा साल गया हो, जब वह जन्माष्टमी पर मथुरा न गए हों। वर्ष 1923 में किसी कारणवश वह मथुरा नहीं पहुंच पाए, तो
उन्होंने लिखा, ‘हसरत की भी कबूल हो मथुरा में हाजिरी, सुनते हैं आशिकों पे, तुम्हारा करम है आज।।’

एक जगह वह लिखते हैं, ‘मन तोसे प्रीत लगाई कन्हाई, काहू और की सुरति अब काहे को आई। तन मन धन सब वार के हसरत, मथुरा नगर चली धूनी रमाई।।

सैयद छेदा शाह कृष्ण भक्त
नर्वल के पास स्थित गांव में रहने वाले सैयद छेदा शाह के कवित्त की दो पंक्तियां ही काफी हैं, भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम साबित करने के लिए, ‘माय देवे गारी, चहें बाप दें
निकारी, सांवरे बिहारी पर तन बलिहारी है।।’
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