कानपुर की शान कहे जाने वाले 'रॉबिनहुड दीक्षित' की लोकप्रियता एक जमाने में इतनी ज्यादा थी कि इंदिरा गांधी भी उनसे प्रभावित हो गईं। तेज तर्रार, मनमौजी, ईमानदार अफसर की कहानियां आज भी शहरवासियों की जुबां पर रहती है। उन्हें 'कानपुर का रॉबिनहुड' भी कहा जाता था। तो आइये जानते हैं कौन थे भगवती प्रसाद दीक्षित जो अपने अंदाज और घुड़सवारी के शौक की वजह से लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ गए।
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भगवती प्रसाद दीक्षित की पुरानी तस्वीर
कानपुर की शान रॉबिनहुड भगवती प्रसाद दीक्षित जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की ठानी। जिनके लिए ईमानदारी कपड़ा, सच्चाई थी रोटी और देशभक्ति उनका मकान थी। कई बार राष्ट्रपति और लोकसभा चुनाव लड़ चुके भगवती प्रसाद दीक्षित (27 अप्रैल 1927 - 1 अक्टूबर 2013) कानपुर के भौती गांव के रहने वाले थे। प्राइमरी स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई कानपुर के सिविल लाइंस स्थित डीएवी कॉलेज से की थी।
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भगवती प्रसाद दीक्षित की पुरानी तस्वीर
उनकी ईमानदारी का सिलसिला 1952 से शुरु हुआ और वह कानपुर डेवलपमेंट बोर्ड (अब केडीए) में अफसर बने। इनकी ईमानदारी से भ्रष्ट अधिकारियों की परेशानी बढ़ गई जब उन्होंने 1958 में भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसके परिणामवश सभी अधिकारी इनके खिलाफ एकजुट होने लगे और इनको झूठे आरोपों में फंसा दिया गया। पिता के कहने पर भगवती प्रसाद ने दूसरे ही दिन अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। 1958 में नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जैसे बड़े नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ा।
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परिवार के साथ पुरानी तस्वीर में भगवती प्रसाद दीक्षित
1961 में ग्रीनपार्क में आयोजित जिस समारोह में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में आए थे वहां भगवती प्रसाद दीक्षित पहुंच गए और अपने बाजे को बजाकर सबको अपनी ओर आकर्षित किया। मुख्यमंत्री द्वारा अधिकारियों संग खाना खाने पर आपत्ति जताते हुए दीक्षित ने कहा- 'ऐसे में तो लगता है, जैसे आप भी इनके साथ मिले हुए हैं।' इस घटना के बाद मुख्यमंत्री के कहने पर इनको आगरा पागलखाने भेज दिया गया। जिद्द पर वह पागल न होने का सर्टिफिकेट लेकर ही वहां से विदा हुए। वह अक्सर कहते थे कि मेरे पास तो पागल न होने का सर्टिफिकेट है, लेकिन नेताओं ने कभी दिमाग की जांच कराई क्या?
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भगवती प्रसाद दीक्षित की पुरानी तस्वीर
भगवती प्रसाद दीक्षित को करीब से जानने वाले आलोक मेहरोत्रा बताते हैं कि दीक्षित ने गांव की प्रधानी से लेकर राष्ट्रपति तक सभी चुनाव लड़े हैं। 1962 में उन्होंने लोकसभा का पहला चुनाव एसएन बनर्जी के खिलाफ कानपुर में लड़ा था, तब उन्होंने चुनाव में एक भी पैसा खर्च न करते हुए आपने घोड़े पर ही चुनाव प्रचार किया था। जहां भाषण देना होता अपना बाजा बजाते और शुरू हो जाते थे। इसके बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ उन्होंने रायबरेली से चुनाव लड़ा और अपने घोड़े संग कानपुर से रायबरेली की ओर रवाना हो गए।
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भगवती प्रसाद दीक्षित की पुरानी तस्वीर
इंदिरा गांधी उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानती थीं। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी ने एक बार उनसे कांग्रेस से चुनाव लड़ने की पेशकश की पर भगवती प्रसाद ने उनका यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।इन्होंने अपने ही अंदाज़ में एक पत्र द्वारा जवाब दिया कि 'आपके और आपके पार्टी के विचार हमारे विचार से मेल नहीं खाते, इसलिए मैं किसी भी पार्टी से नहीं जुड़ूंगा।' इतना ही नहीं उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ साउथ जाकर चुनाव लड़ा और उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़कर हार गए।
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भगवती प्रसाद दीक्षित की पुरानी तस्वीर
रॉबिनहुड दीक्षित 1967 से 1991 के बीच कई बार चुनावी मैदान में उतरे। 1980 में कानपुर के युवाओं से भरपूर समर्थन मिला जिसको देखकर अधिकारियों ने इनको हराने के लिए वोटों के साथ हेरफेर करके कांग्रेस के कुरैशी को विजयी बना दिया था।
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भगवती प्रसाद दीक्षित की पुरानी तस्वीर
वह कहते थे ‘पलट कर देखो सारा निजाम दुनिया का, अभी देख रहा हूं जमाने की हवा क्या है।’ अचानक तबियत बिगड़ने के बाद 1 अक्टूबर की सुबह एयरफोर्स अस्पताल ले जाया गया जहां स्वास्थ में सुधार न होता देख वहां से भार्गव नर्सिंग होम भेज दिया गया।
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भगवती प्रसाद दीक्षित की पुरानी तस्वीर
वहां 1 अक्टूबर 2013 दोपहर 12.10 बजे उनका निधन हो गया। कानपुरवासी इस आकर्षक व्यक्तित्व वाले कर्मठशील नेता को कभी भी नहीं भूल पाएंगे।
भगवती प्रसाद दीक्षित भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में अपने घोड़े को मंच बनाते थे और भाषण को अपनी शक्ति। चुनाव में नारा था “न कोई किच –किच, सिर्फ भगवती प्रसाद दीक्षित”