यूपी के कानपुर शहर में गंगा के घाटों के पुनरुद्धार का जिम्मा लेने वाले शिपिंग (पानी के जहाज) कंपनी के मालिक रवि कुमार मेहरोत्रा की अपनी माटी से मोहब्बत बेमिसाल है। खुद के खड़े किए हुए जहाज के कारोबार में तब्दीली का मौका आया तो... उन्होंने दो जहाज इसलिए बचा लिए, क्योंकि उनमें से एक जहाज का नाम ‘कानपुर’ था और दूसरे का ‘बरेली’।
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रवि कुमार मेहरोत्रा
रवि कुमार मेहरोत्रा ने इन जहाजों का नामकरण इन दो शहरों के नाम पर इसलिए किया था ताकि उन्हें अपनी माटी और अपनों की याद आती रहे। कानपुर रवि बाबू की जन्मस्थली है और बरेली उनकी ससुराल। दोनों जहाजों पर बड़े अक्षरों में दोनों शहरों का नाम लिखा है। ये समुद्री मालवाहक जहाज दुनिया भर में भ्रमण करते हैं, कानपुर और बरेली के नाम से बुलाए जाते हैं। अपने शहर और अपनों से प्रेम के लिए रवि बाबू का जिक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि दूर देश लंदन में रहने के बावजूद उन्हें गंगा के घाटों की चिंता है। इसीलिए उन्होंने शहर के गंगा घाटों को गोद लिया है।
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रवि कुमार मेहरोत्रा
रवि बाबू से मेरी मुलाकात करीब चार साल पहले जीएनके इंटर कालेज में हुई थी। विश्व हिंदू परिषद से जुड़ाव होने की वजह से उन्होंने मुझसे गंगा की दशा पर चिंता जाहिर की थी। उन्होंने कहा था ‘गंगा मइया की हालत ठीक नहीं है। हम सभी को कुछ करना होगा।’ गंगा घाटों को लेकर भी उन्होंने चिंता जाहिर की थी। जीएनके की एक बालिका शाखा खोलने की भी इच्छा जाहिर की थी। शहर आते हैं तो मुलाकात जरूर करते हैं।
रामनाथ महेंद्र, सराफा कारोबारी, (विहिप नेता)
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कानपुर और बरेली के नाम से पानी के जहाज
उत्तर भारत के लोगों को भी पानी के जहाज में काम करने की ट्रेनिंग मिले, इसी उद्देश्य से रवि सर ने यह इंस्टीट्यूट खोला है। वे अपने शहर को बहुत याद करते हैं। यही वजह है कि पॉश एरिया आर्यनगर की बेशकीमती जमीन को उन्होंने बेचा नहीं, बल्कि शहर को इंस्टीट्यूट के नाम पर एक उपलब्धि दे दी है।
कैप्टन योगेश भाटी, अमर मेरीटाइम ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट
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कानपुर और बरेली के नाम से पानी के जहाज
व्यवसाय की वजह से उन्हें देश से बाहर भले ही जाना पड़ा हो लेकिन उनके दिल में देश, प्रदेश और शहर के प्रति बहुत स्नेह है। हर सप्ताह उनसे टेलीफोन पर बात होती है। वे अपने जानने वालों की कुशलछेम पूछते हैं। इस इंस्टीट्यूट में माता पिता की मूर्ति इसीलिए स्थापित की ताकि उनका नाम हमेशा जिंदा रहे।
देवेंद्र सिंह, कोआर्डिनेटर, अमर मेरीटाइम ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट
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पत्नी संग रवि मेहरोत्रा
मैं रवि बाबूके साथ लंबे समय तक रहा हूं। वे कानपुर को हमेशा याद करते हैं। गंगा घाटों को साफ सुथरा बनाने के लिए कई बार चर्चा कर चुके हैं। जल्द ही वे इस पर काम शुरू कराएंगे। इसके अलावा और भी कई काम उन्होंने शहर के लिए सोच रखे हैं। मौका मिला तो उन्हें भी पूरा कराएंगे।
मुकुल वर्मा, रवि बाबू के चचेरे दामाद
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रवि मेहरोत्रा के मां-पिता की प्रतिमा
- फोटो : अमर उजाला
आर्यनगर में रहे, जीएनके में पढ़े
रवि कुमार मेहरोत्रा की इंटर तक की पढ़ाई सिविल लाइंस स्थित गुरुनानक खत्री (जीएनके) इंटर कालेज में हुई। शहर के पॉश एरिया आर्यनगर में हुंडई शोरूम के सामने उनका घर है। पिता छोटे लाल मेहरोत्रा वीएसएसडी कालेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। पांच भाइयों और दो बहनों का समृद्ध परिवार था। सबसे बड़े भाई डॉ. मुराली लाल मेहरोत्रा देश के विख्यात ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) विशेषज्ञ रहे। इनसे छोटे श्याम बिहारी, विपिन बिहारी, शशि कुमार मेहरोत्रा थे। दो बहनें कांति और सुशीला थीं। इन सभी का निधन हो चुका है। इन सबमें रवि बाबू सबसे छोटे हैं और लंदन में रहते हैं। रवि बाबू का बेटा सौरभ और बेटी मंजरी सेठ भी विदेश में रहते हैं।
स्वरूप नगर स्थित रवि मेहरोत्रा का मकान
- फोटो : अमर उजाला
मां के नाम से इंस्टीट्यूट और कंपनी
आर्यनगर में जिस स्थान पर रवि बाबू का घर था, वहां अब उनकी मां अमर देवी के नाम से अमर-मेरीटाइम ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खुला है। मां के निधन के बाद वर्ष 2000 में उन्होंने उत्तर भारत के पहले मरीन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की शुरुआत की। वर्ष 2014 में इसी इंस्टीट्यूट में मां और पिता की मूर्ति की स्थापना कराई। उनकी पहली कंपनी का नाम भी अमर शिपिंग है।