तीन अलग-अलग देशों में पांच हत्याएं होती हैं। मारने वाली तीन युवतियां हैं। एक वक्त ऐसा भी आता है कि तीनों किसी अन्य देश में एक साथ रहने लगती हैं। इन हत्याओं की गुत्थी सुलझती है तो चौंकाने वाला सच सामने आता है। वे तीन नहीं थीं। बल्कि एक ही युवती थी जो अलग अलग तरह से बर्ताव कर रही थी। ये युवती बचपन में अपने पिता के दोस्त से यौन शोषण का शिकार हुई थी। डिसेसिएटिव आईडेंटिटी डिसआर्डर बीमारी पर आधारित यह अमेरिकन स्टाइल क्राइम थ्रिलर लिखा है कानपुर की कीर्ति श्रीवास्तव ने। वह भी ऐसी हालत में जब वे खुद पैरों से लाचार थीं।
ग्रामीण बड़ौदा बैंक से रिटायर्ड अधिकारी अनिल कुमार श्रीवास्तव की बेटी कीर्ति इन दिनों भारतीय स्टेट बैंक जयपुर में डिप्टी मैनेजर (क्रेडिट एनालिस्ट) हैं। 17 जून को वह जयपुर से कानपुर लौट रही थीं तभी रास्ते में उनका एक्सीडेंट हो गया। बुरी तरह घायल हुईं। एक पैर फ्रैक्चर हो गया। इलाज के दौरान वह अस्पताल की सीढ़ियों से फिसल गईं और उनका दूसरा पैर भी टूट गया। डॉक्टरों को उनके दोनों पैरों का ऑपरेशन करना पड़ा। पैर से लाचार हुईं कीर्ति ने इस वक्त को यादगार बनाने की ठानी। उन्होंने अपने लिखने-पढ़ने के शौक को नया आयाम देने की कोशिश की। क्राइस्टचर्च कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट कीर्ति ने डिसेसिएटिव आईडेंटिटी डिसआर्डर बीमारी को आधार पर बनाकर क्राइम थ्रिलर पर लिखना शुरू किया। महज 20 दिन में ही उन्होंने 218 पेज का उपन्यास लिख डाला। कीर्ति को अमेरिकन स्टाइल फिक्शन में रुचि है। उनके घर पर 500 नावेल का कलेक्शन है।