फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पैर लाचार थे, थाम ली कलम और 20 दिन में लिख डाला नॉवेल

Fri, 24 Aug 2018 01:14 PM IST
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर

सार

-एक्सीडेंट में घायल हुई थीं कृष्णापुरम की कीर्ति श्रीवास्तव, दोनों पैरों का हुआ है आपरेशन 
-एसबीआई जयपुर में डिप्टी मैनेजर हैं, डिसेसिएटिव आईडेंटिटी डिसआर्डर बीमारी पर आधारित है उपन्यास 
विज्ञापन
कीर्ति श्रीवास्तव
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

तीन अलग-अलग देशों में पांच हत्याएं होती हैं। मारने वाली तीन युवतियां हैं। एक वक्त ऐसा भी आता है कि तीनों किसी अन्य देश में एक साथ रहने लगती हैं। इन हत्याओं की गुत्थी सुलझती है तो चौंकाने वाला सच सामने आता है। वे तीन नहीं थीं। बल्कि एक ही युवती थी जो अलग अलग तरह से बर्ताव कर रही थी। ये युवती बचपन में अपने पिता के दोस्त से यौन शोषण का शिकार हुई थी। डिसेसिएटिव आईडेंटिटी डिसआर्डर बीमारी पर आधारित यह अमेरिकन स्टाइल क्राइम थ्रिलर लिखा है कानपुर की कीर्ति श्रीवास्तव ने। वह भी ऐसी हालत में जब वे खुद पैरों से लाचार थीं।
विज्ञापन


ग्रामीण बड़ौदा बैंक से रिटायर्ड अधिकारी अनिल कुमार श्रीवास्तव की बेटी कीर्ति इन दिनों भारतीय स्टेट बैंक जयपुर में डिप्टी मैनेजर (क्रेडिट एनालिस्ट) हैं। 17 जून को वह जयपुर से कानपुर लौट रही थीं तभी रास्ते में उनका एक्सीडेंट हो गया। बुरी तरह घायल हुईं। एक पैर फ्रैक्चर हो गया। इलाज के दौरान वह अस्पताल की सीढ़ियों से फिसल गईं और उनका दूसरा पैर भी टूट गया। डॉक्टरों को उनके दोनों पैरों का ऑपरेशन करना पड़ा। पैर से लाचार हुईं कीर्ति ने इस वक्त को यादगार बनाने की ठानी। उन्होंने अपने लिखने-पढ़ने के शौक को नया आयाम देने की कोशिश की। क्राइस्टचर्च कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट कीर्ति ने डिसेसिएटिव आईडेंटिटी डिसआर्डर बीमारी को आधार पर बनाकर क्राइम थ्रिलर पर लिखना शुरू किया। महज 20 दिन में ही उन्होंने 218 पेज का उपन्यास लिख डाला। कीर्ति को अमेरिकन स्टाइल फिक्शन में रुचि है। उनके घर पर 500 नावेल का कलेक्शन है। 

 
विज्ञापन

‘द मी यू विल नेवर नो’...

डेमो पिक
कीर्ति ने अपने उपन्यास का नाम रखा ‘द मी यू विल नेवर नो’। भारत, सिंगापुर और मलेशिया में काम करने वाली प्रकाशक कंपनी नोशनप्रेसडॉटकॉम ने यह नावेल प्रकाशित किया। 4 अगस्त को इसका पहला संस्करण बाजार में आया। अब ये उपन्यास अमेजॉन और फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध है। पहली किताब की सफलता से गदगद कीर्ति अब दूसरे उपन्यास पर काम कर रही हैं। 

कीर्ति बोलीं...
डिसेसिएटिव आईडेंटिटी डिसआर्डर एक मनोरोग है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति अनजाने में अलग अलग शख्सियतों के रूप में व्यवहार करने लगता है। ऐसी मनोदशा किन स्थितियों में हो सकती है यह बताने का प्रयास किया है। यह उपन्यास ऑस्ट्रेेलिया की सत्य घटना से प्रेरित है। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें