कानपुर। नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट में 722 हरे और जवान पेड़ काटे जाने के मामले में पर्त दर पर्त उधड़ रही है। पेड़ों की लकड़ी कहां गायब हो गई। इस तफ्तीश पर बताया गया कि लकड़ी का इस्तेमाल बॉयलर में किया गया लेकिन वर्ष 2006 के सत्र में इंस्टीट्यूट की प्रायोगिक चीनी मिल के लिए लकड़ी ही नहीं मांगी गई। इस संबंध में चीन मिल के फोरमैन ने वन विभाग की टीम को अपना बयान भी दिया है।
एनएसआई की प्रायोगिक चीनी मिल साल में एक से डेढ़ महीने के लिए चलती है। इसमें छात्र-छात्राएं चीनी बनाना सीखते हैं। विभागीय जिम्मेदारों के मुताबिक मिल के बॉयलर में 80 से 100 टन लकड़ी लगती है। बॉयलर के कर्मचारी इसके लिए इंडेंट बनाकर निदेशक के यहां भेजते हैं। टेंडर जारी हो जाता है। प्रायोगिक चीनी मिल के बजट में लकड़ी खरीद भी शामिल रहती है।
फोरमैन के दर्ज बयान के मुताबिक इस बार लकड़ी के लिए इंडेंट जारी ही नहीं किया। इसके अलावा जांच टीम को पुरानी लकड़ी भंडार में मिली है, वह आठ से 10 महीने पहले की कटी है। वन क्षेत्राधिकारी राकेश कुमार पांडेय के मुताबिक एनएसआई प्रबंधन और तिवारी वुड्स के बीच आधी-आधी लकड़ी बांटने का करार हुआ था। इंस्टीट्यूट को आधी लकड़ी का राजस्व जमा करना था पर जमा नहीं किया गया। वन विभाग की टीम 722 पेड़ों की कटान को लेकर राजस्व हानि का आकलन कर रही है। एनएसआई में चर्चा है कि जो अधिकारी एफआईआर में नामजद हैं, उनमें आपसी कलह जोर पकड़ रही है। सब एक-दूसरे की पोल खोलने में लगे हैं। सीधे मंत्रालय को शिकायती पत्र भेजने का सिलसिला जारी है।