झींझक। नगर में करीब आठ दशक से अधिक समय से रामलीला का मंचन हो रहा है। जबकि शुरुआत किसान मजदूर संघ ने की थी। हालांकि यह परंपरा अनवरत जारी है। विद्यालय की भूमि पर लीला मंचन हो रहा है।
झींझक की रामलीला सामाजिक सद्भाव और आपसी सहयोग की अनूठी मिसाल रही है। बुजुर्ग बताते हैं कि आयोजन की जिम्मेदारी मोहम्मद यूनिस खां निभाते थे। अब व्यापारी और नगर के लोग मिलकर चंदा जुटाते हैं। वर्ष 1940 में किसान मजदूर संघ रामलीला कमेटी ने बस्ती मोहल्ले में रामलीला की शुरुआत की थी। तब कमेटी के अध्यक्ष पूर्व चेयरमैन दिवंगत मन्नीबाबू तिवारी थे। गंगा प्रसाद पोरवाल और विनोद सिंह समेत कई लोग आयोजन में सहयोग करते थे।
वर्ष 1971 में श्रीआदर्श रामलीला कमेटी व्यापारिक मंडल की स्थापना हुई और 1972 में इसका पंजीकरण कराया गया। उस समय डॉ. रामकिशन गुप्ता अध्यक्ष, रामसिंह कोषाध्यक्ष और मोहम्मद यूनिस खां स्टेज इंचार्ज थे। विभिन्न समुदायों के लोगों की भागीदारी ने रामलीला को आपसी सौहार्द की पहचान दिलाई। हालांकि रामलीला का मंचन वर्षों से होता चला आ रहा है लेकिन कमेटी बनने पर यह अस्तित्व में आई। वहीं, किसान मजदूर संघ रामलीला कमेटी ने करीब 1995 में रामलीला मंचन बंद कर दिया। इधर श्रीआदर्श रामलीला कमेटी व्यापारिक मंडल लगातार आयोजन करा रहा है।
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अलग-अलग स्थानों पर होता था मंचन
शुरुआती दौर में रामलीला के अलग-अलग प्रसंगों का मंचन नगर के विभिन्न स्थानों पर किया जाता था। रेल बाजार में धनुष भंग, चंद्रा मेडिकल के पास लक्ष्मण शक्ति और जूनियर स्कूल मैदान में रावण दहन होता था। वर्ष 1990 में पूरी रामलीला जूनियर स्कूल मैदान में कराने की शुरुआत हुई। उस समय सुरेंद्र सिंह गौर कमेटी के अध्यक्ष थे। पहले रामलीला देखने के लिए मंगलपुर, कंचौसी, रसूलाबाद, औरैया समेत दूर दूर के सैकड़ों गांवों से हजारों लोग पहुंचते थे। दशहरा मेला भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहता था। समय के साथ मनोरंजन के साधन बढ़ने और परिस्थितियों में बदलाव के चलते दर्शकों की संख्या में कमी आई है।
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फोटो-3- विमल शुक्ला।
स्थायी मैदान मिलने का इंतजार
वर्तमान में रामलीला का आयोजन बीआरसी परिसर में किया जा रहा है। कमेटी को अब तक अपनी जमीन नहीं मिल सकी है। स्थायी मैदान के अभाव में हर साल आयोजन की व्यवस्था करने में परेशानी होती है। कमेटी के मुख्य संयोजक अवधेश पोरवाल व कोषाध्यक्ष विमल शुक्ला का कहना है कि झींझक की रामलीला की अलग पहचान है। इसे व्यवस्थित और भव्य रूप देने के लिए लंबे समय से स्थायी मैदान की मांग की जा रही है। नगर के लोगों को उम्मीद है कि वर्षों पुरानी इस सांस्कृतिक परंपरा को जल्द ही अपना स्थायी ठिकाना मिल सकेगा।
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फोटो- 2- अवधेश उर्फ छोटे पोरवाल।
गैस बत्ती जलाकर की जाती थी रोशनी
कमेटी के मुख्य संयोजक अवधेश उर्फ छोटे पोरवाल बताते हैं कि पुरानी रामलीला में नगर के बड़ेलाल राजा का किरदार, हसनअली शाह दरबार में रहते थे, ओमप्रकाश शर्मा जनक का पाठ करते थे, गोपी तिवारी राम का किरदार निभाते रहे। रज्जन कौमिक का किरदार निभाते थे। उस समय बिजली व्यवस्था न होने पर गैस बत्ती जलाकर रोशनी की जाती थी।