भार्गव हॉस्पिटल सिविल लाइंस में बुधवार को इलाज के दौरान एक बच्चे तनिष्क की मौत पर तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं। परिजन आरोप लगा रहे हैं कि अस्पताल में डॉक्टर की जगह एक कर्मचारी ने गलत इंजेक्शन लगा दिया।
इससे मौत हो गई जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण कुछ और ही निकला है। बुधवार देर रात एक बजे तनिष्क का तीन डॉक्टरों के पैनल ने पोस्टमॉर्टम किया। वीडियोग्राफी के बीच डॉक्टरों को तनिष्क के फेफड़ों में मवाद और इंफेक्शन मिला।
डॉक्टरों ने प्रथम दृष्टया मौत का कारण सेप्टीसिमिया इंफेक्टेड लंग्स डिजीज (इंफेक्शन के कारण फेफड़े की बीमारी) माना है। तनिष्क के फेफड़े, पेट के तरल पदार्थ के साथ ही इंजेक्शन लगने वाले स्थान के चमड़े और मांस को सुरक्षित कर लिया है। इसे जांच के लिए केजीएमयू लखनऊ भेजा जा रहा है।
बता दें कि पान दरीबा लाटूश रोड निवासी तनिष्क सोनकर (12) फल कारोबारी सुनील सोनकर का बेटा था। बुधवार को तनिष्क के पेट में दर्द हुआ तो परिजन उसे लेकर भार्गव हॉस्पिटल पहुंचे। आरोप है कि हॉस्पिटल की इमरजेंसी में तैनात विशाल नाम के एक युवक ने खुद को डॉक्टर बताया और मेडिकल स्टोर से इंजेक्शन मंगाकर लगा दिया।
इंजेक्शन लगते ही तनिष्क के आंखों के सामने अंधेरा छा गया। बाद में आईसीयू में उसकी मौत हो गई। गुरुवार को ‘अमर उजाला’ को पड़ताल में सूत्रों से पता चला है कि तनिष्क को दर्द में इस्तेमाल किया जाने वाला ‘डॉयनापार’ इंजेक्शन (आधा एमएल) लगाया गया था।
यह इंजेक्शन आईवी (नस में) और आईएम (मांस में) दोनों ही जगह लगाया जा सकता है। परिजनों का कहना है कि तनिष्क के हाथ की नस में इंजेक्शन लगाया गया।
भार्गव विवाद में मोहर्रम बाद कार्रवाई
आईएमए अध्यक्ष डॉ. आरती लालचंदानी ने गुरुवार शाम चार बजे जवाहर लाल रोहतगी अस्पताल सर्वोदय नगर में सदस्यों की आपातकालीन बैठक बुलाई। बैठक में भार्गव प्रकरण पर आगे की रणनीति पर चर्चा होनी थी।
बैठक शुरू होने से कुछ समय पहले अध्यक्ष डॉ. चंदानी, सचिव डॉ. अर्चना भदौरिया, डॉ. बृजेंद्र शुक्ला, डॉ. एसएम शुक्ला, डॉ. विकास मिश्रा ने एसएसपी शलभ माथुर से उनके आवास में मुलाकात की।
डॉ. चंदानी ने बताया कि एसएसपी ने मोहर्रम के बाद आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो डॉक्टर मरीजों की सेवा करने में डरेंगे।
भार्गव हॉस्पिटल को सशर्त इलाज की मंजूरी
बुधवार देर रात भार्गव हॉस्पिटल सिविल लाइंस को भर्ती मरीजों के सशर्त इलाज की अनुमति मिली। रात में प्रशासन मरीजों को दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट करा रहा था। इस बीच वहां पहुंची डॉ. दया भार्गव ने कहा कि वह मरीजों का इलाज करने में सक्षम हैं।
इसके बाद सिटी मजिस्ट्रेट ने डॉक्टर को खुद के रिस्क पर मरीजों के इलाज की अनुमति दी। साथ ही कहा कि यदि मरीजों के साथ कुछ हुआ तो इसकी जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन की होगी।
एक्ट लागू हो तभी लग सकेगी लगाम
क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट 2010 में नर्सिंग होम, क्लीनिक, पैरामेडिकल स्टाफ की योग्यता आदि के नियम बनाए गए हैं। एक्ट के तहत नर्सिंग होम या क्लीनिक में डॉक्टर की मौजूदगी के साथ ही प्रशिक्षित स्टाफ, बेड, अस्पताल व क्लीनिक का एरिया, उपकरणों के साथ ही प्रशासन के हस्तक्षेप को भी शामिल किया गया है लेकिन लागू नहीं है। असर यह हुआ कि स्वास्थ्य विभाग नर्सिंग होम का सिर्फ लाइसेंस सस्पेंड ही कर सकता है।