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कानपुर की हवा में समाया स्वाइन फ्लू, डॉक्टर भी चपेट में, इससे पहले मौत दे दस्तक हो जाएं सचेत

Thu, 21 Feb 2019 01:33 PM IST
प्रशांत कुमार यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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स्वाइन फ्लू का संक्रमण हवा में समा गया है। कानपुर के दो दर्जन से अधिक मोहल्लों के लोगों के सैंपल जांच के लिए माइक्रोबायोलॉजी विभाग भेजे गए। इनमें अधिकांश रोगी पहले निजी पैथोलोजिकल लैब से पॉजीटिव आए और कुछ माइक्रोबायोलॉजी विभाग ने पुष्ट कर दिए। तीन-चार रोगियों को छोड़कर बाकी किसी रोगी की बाहर जाने की हिस्ट्री नहीं है। उन्हें संक्रमण उनके इलाके से ही मिला है। डॉक्टरों का कहना है कि लोग घबराएं नहीं, समय से दवा खा लें। स्वाइन फ्लू संक्रमण के बाद सिर्फ 20 फीसदी रोगी ही गंभीर होते हैं।
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शुरुआत में एक महिला समेत तीन रोगी ऐसे आए जिनकी राजस्थान, दिल्ली जाने की हिस्ट्री मिली है। इसके बाद माइक्रोबायोलॉजी की लैब से पुष्ट 17 रोगियों को संक्रमण कहां से मिला है, यह पता नहीं चला। रोगी शहर में ही रहे हैं। कहीं बाहर नहीं गए। इसका मतलब उन्हें संक्रमण शहर से ही हुआ। इसके अलावा निजी लैब से स्वाइन फ्लू पुष्ट हुए तकरीबन 60 रोगियों की भी कोई हिस्ट्री नहीं है। स्वाइन फ्लू पॉजीटिव रोगी शास्त्रीनगर, कल्यानपुर, बर्रा, नौबस्ता, जाजमऊ, मंधना, साकेतनगर, केशवपुरम, गोविंदनगर, काकादेव, किदवईनगर आदि इलाकों के हैं। सीएमओ डॉ. अशोक शुक्ला का कहना है कि जो रोगी पॉजीटिव आते हैं उन्हें दवा दे दे जाती है।
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एक मौसम का नेचुरल वैक्सीनेशन होता स्वाइन फ्लू में

रोगियों का इलाज करने में मेडिकल कॉलेज के कई डॉक्टर भी चपेट में आए हैं। हैलट इमरजेंसी प्रभारी डॉ. प्रेम सिंह भी वर्ष 2017 में रोगी के संपर्क में आने के बाद स्वाइन फ्लू पॉजीटिव हो गए। उनके अलावा दो अन्य डॉक्टर और तीन सीनियर रेजीडेंट को भी स्वाइन फ्लू का संक्रमण हुआ। डॉ. प्रेम सिंह का कहना है कि 80 फीसदी रोगियों को बिना जांच के स्वाइन फ्लू पता ही नहीं चलता। 20 फीसदी की तबियत बिगड़ती है। वे इलाज से ठीक हो जाते हैं। सिर्फ एक फीसदी रोगियों की मौत होती है। उनमें डायबिटीज, लिवर, गुर्दे आदि क्रोनिक रोगों के मरीज होते हैं। छोटे बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। अगर तेज सांस फूले, उंगलियां नीली पड़ जाएं और ब्लडप्रेशर कम होने लगे तो फौरन इलाज शुरू कर देना चाहिए। दवा जितनी जल्दी हो शुरू कर देना चाहिए।


स्वाइन फ्लू में एक सीजन के लिए ही नैचुरल वैक्सीनेशन होता है। नेचुरल वैक्सीनेशन का मतलब है कि रोगी को हल्का संक्रमण हो और उसके शरीर में रोग के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाए। ऐसा अधिकांश रोगों में होता है लेकिन स्वाइन फ्लू का वायरस हर साल अपनी प्रकृति बदल लेता है। इससे एक सीजन का नेचुरल वैक्सीनेशन अगले सीजन में प्रभावी नहीं होता। मेडिसिन के विशेषज्ञ डॉ. कुणाल सहाय ने बताया कि इसी से स्वाइन फ्लू की वैक्सीन भी एक साल के लिए बनती है। अगले साल वायरस के स्ट्रेन के हिसाब से उसे फिर तैयार करना पड़ता है।
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