जिला कृषि अधिकारी आवेश सिंह बताते हैं कि सूरजमुखी की तुलना में मक्का की खेती में सिंचाई के दौरान पानी की खपत ज्यादा होती है, और लागत भी ज्यादा आती है, इसलिए जिला प्रशासन ने सूरजमुखी की खेती को बढ़ावा देने के लिए खाका तैयार किया है। इस के तहत किसानों को सूरजमुखी की खेती में आने वाली कम लागत, कम संसाधन, बाजार में अच्छी कीमत की जानकारी देकर उन्हें जागरुक और प्रेरित किया जाएगा।
इसके लिए यहां बाकायदा बंगलुरु से कृषि वैज्ञानिकों की टीम बुलाकर किसानों को जागरूक किया जाएगा। यह कार्यक्रम सोमवार को कलक्ट्रेट सभागार में होना तय हुआ है। वसंत पंचमी के बाद मौसम बदलते ही तापमान में इजाफा होगा और गर्मी दस्तक देने लगेगी। इसी दौरान मार्च से जून के बीच जायद खेती की शुरूआत होगी। इसी दौरान यहां मक्का की खेती शुरू होगी। प्रशासन की तैयारी है कि किसान इसी दौरान सूरजमुखी की भी खेती करें।
मक्का और सूरजमुखी की खेती करने पर तुलनात्मक लागता और मुनाफा सामने आने पर इसका बेहतर नतीजा आएगा। जिले में पहले 25 से 30 हजार हेक्टेयर में सूरजमुखी की खेती होती थी। जो धीरे-धीरे सिमटती रही। अब नतीजा यह है कि एक दशक से यहां इसकी खेती ही नहीं हो रही है। मंडी प्रशासन के मुताबिक जिले में आखिरी बार 2015-2016 में सूरजमुखी की खरीद हुई थी। बाद में उपज न होने की वजह कर खरीद प्रक्रिया बंद कर दी गई। सदर ब्लॉक के उदैतापुर के किसान विशाल दुबे के मुताबिक क्षेत्र में वर्ष 2010 से पहले सूरजमुखी की खेती होती थी।
उसके बाद बंद हो गई। वह खुद 50 बीघे में खेती करते थे। कारण बताया कि उत्पादन कम होने और मंडी में भाव ठीक नहीं मिल रहा था। बरसात में खराब होने के संभावना रहती थी। हालांकि मक्का की तुलना में सिंचाई में पानी कम लगता है। सदर ब्लॉक के मोचीपुर के किसान सजंय कटियार 100 बीघा में सूरजमुखी की खेती करते थे। मक्का की अपेक्षा सूरजमुखी अच्छी थी, लेकिन बीज अच्छा न मिल पाने के कारण लागत नहीं निकलती थी। बीज कंपनिया नकली बीज किसान को देती थीं। जिस कारण सूरजमुखी की तरफ किसान का मोह भंग हो गया। मक्का की फसल में मुनाफा ज्यादा मिलने लगा।