अब दलहन की ग्रीष्म कालीन खेती की जाएगी। इस पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की मुहर लग गई है। इसके मुताबिक अप्रैल, मई और जून में जो खेत खाली पड़े रहते हैं, उनमें उड़द, मंग की खेती की जाएगी।
यूपी सहित उत्तर भारत के तमाम राज्यों के 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में दलहन की खेती का लक्ष्य तय किया गया है। इससे दलहन की पैदावार करीब 20 लाख टन बढ़ाया जाना है।
आईसीएआर और आईआईपीआर ने मंगलवार को गैर पारंपरिक क्षेत्रों में दलहनी फसलों का प्रसार विषयक दो दिवसीय (9-10 फरवरी) कार्यशाला का आयोजन किया। इसका उद्घाटन आईसीएआर के संयुक्त महानिदेशक डॉ. डीबी सिंह ने किया। साथ ही कहा कि यूपी, पंजाब और हरियाणा के ज्यादातर क्षेत्रों में धान, गेहूं की खेती की जाती है।
मार्च के आखिरी सप्ताह से खेत खाली होते हैं, जो अप्रैल, मई और जून में ऐसे ही पड़े रहते हैं। अब इसका लाभ दलहनी फसलों की बुआई से लिया जाएगा। आईआईपीआर के निदेशक प्रो. एनके सिंह ने कहा कि मंूग और उड़द की अच्छी प्रजातियां हैं। 55 दिन में पकने और चार सिंचाई में पैदा होने वाली प्रजाति भी है। इसका सफल परीक्षण किया जा चुका है।
दलहन विकास निदेशालय भोपाल के निदेशक डॉ. एके तिवारी ने कहा कि भारत में 200 लाख टन दाल की जरूरत पड़ती है लेकिन पैदावार 170-180 लाख टन ही हो पा रही है। ग्रीष्म कालीन खेती से दलहनी फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सकती है। प्रोडक्शन बढ़ने के बाद दाल की महंगाई भी नियंत्रित होगी।
कोआर्डिनेटर डॉ. संजीव गुप्ता ने कहा कि यूपी के कई जिलों मेें ग्रीष्मकालीन दलहनी फसलों की बुआई इस बार कराई जाएगी। इसका खाका तैयार किया जा चुका है। दो दिवसीय कार्यशाला में तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित 10 राज्यों के दलहन विज्ञानी, अधिकारियों ने हिस्सा लिया है।