आयकर विभाग के सूत्र बताते हैं कि 11 करोड़ रुपये की करेंसी में दो हजार रुपये की गड्डियों के कई बंडल ऐसे थे, जिनमें रिजर्व बैंक की सील लगी थी। ये गड्डियां करेंसी चेस्ट पहुंचने से पहले ही केशव लाल के घर पहुंच चुकी थीं। पूछताछ में केशव लाल ने कुछ बैंकों के नाम भी लिए थे, जहां से उन्होंने अपने गुर्गों के जरिए नोट बदलवाए। इसमें आधा दर्जन से अधिक बैंकों का फंसना तय था। बाद में पता नहीं क्या हुआ कि एक भी बैंक जांच के दायरे में नहीं आया।
आयकर विभाग ने केशव लाल के घर से मिले नोटों का ब्योरा तैयार कर एक रिपोर्ट रिजर्व बैंक को भेजी थी। रिजर्व बैंक को करेंसी में दर्ज सीरियल नंबर भेजकर यह जानकारी मांगी गई थी कि यह किस बैंक से जारी हुए। रिजर्व बैंक के पास बैंकों को भेजी गई करेंसी का डाटा उपलब्ध रहता है। इस प्रकरण में रिजर्व बैंक ने भी हद दर्जे की लापरवाही दिखाई। आयकर विभाग की रिपोर्ट को गंभीरता से नहीं लिया और न कोई जवाब दिया।
आयकर अफसरों ने दो रिमाइंडर भेजे, फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया। कुल मिलाकर आयकर विभाग और रिजर्व बैंक के स्तर पर बैंकों की भूमिका की पड़ताल में लचर रुख अपनाया गया। हालांकि अमर उजाला में खबर छपने के बाद जांच निदेशालय के प्रधान निदेशक अमरेंद्र कुमार का कहना है कि मामला सीबीआई को रेफर किया गया है।