डॉ. अनुपमा पाल, महिला चिकित्साधिकारी, जालौन
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बच्चे कहते घर से काम करो, डॉक्टर हूं कैसे करूं
जालौन सीएचसी में बने कोरोना आइसोलेशन वार्ड में 240 महिला संदिग्धों की जांच करने वालीं डॉ. अनुपमा की दस साल बेटी और सात साल का बेटा उनसे वर्क फ्रोम होम करने की बात कहते हैं। बच्चे कोरोना से डरे हुए हैं, डॉक्टरों के आए दिन चपेट में आने वाली खबरों से व्याकुल हो उठते हैं।
मैं उनसे कहती हूं कि मैं डॉक्टर हूं, घर से काम नहीं कर सकती। अस्पताल को मेरी जरूरत है। डॉ. अनुपमा मानती हैं कि इस काल में ड्यूटी के साथ थोड़ा डर भी है। लेकिन सतर्कता से ही आपकी जीत होगी। पति बच्चों का हौसला बढ़ाते हैं।
दीवारों पर संदेश लिखता हूं ताकि लोग समझें
कोरोना से इस युद्ध में अपनी कला के माध्यम से लोगों में जागरूकता फैला रहे शारदा प्रसाद साहू मानते हैं कि एक अच्छा संदेश यदि लोगों के जहन में बैठ गया तो वह उसे हमेशा याद रखते हैं। रंगों का डिब्बा और हाथों में तूलिका लेकर शारदा शहर की दीवारों पर कोरोना से बचने के संदेश लिखते हैं।
ऐसे करने के लिए न तो उन्हें कोई वित्तीय सहायता मिलती है न ही सरकारी धन। वह मन से इस लड़ाई में कूदे हैं। कड़ी धूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। शहर में 50 से ज्यादा स्थानों पर जागरूकता भरे संदेश लिख चुके हैं, ताकि जिसकी भी नजरें पडे़ जागरूक हो।