रोगी को कहीं शिफ्ट नहीं करना पड़ता
इसमें ओटी और कार्डियक कैथेटेराइजेशन (कैथ) लैब एक ही जगह होती है। हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद यह देखा जाता है कि नसें सही जुड़ी हैं कि नहीं। यह कैथ लैब में देखा जाता है। रोगी को कहीं शिफ्ट नहीं करना पड़ता। उन्होंने बताया कि इंस्टीट्यूट के दूसरे तल पर सेंटर बनाया जा रहा है। इसके लिए तैयारियां पूरी हैं।
यह प्रदेश का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट सेंटर होगा
प्रोफेसर वर्मा ने बताया कि मार्च में ट्रांसप्लांट सेंटर के लिए आवेदन करेंगे। इस संबंध में आवेदन मार्च में ही होता है। वह खुद भी लाइसेंस के मामले के निरीक्षक रहे हैं। इसी से पहले सारी तैयारी कर ली है। तीन महीने में निरीक्षण के बाद अंतिम रिपोर्ट लग जाती है। उन्होंने बताया कि यह प्रदेश का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट सेंटर होगा।
हाइब्रिड ऑपरेशन थिएटर की प्रक्रिया मार्च के पहले पूरी कर लेंगे
अभी प्रदेश में यह व्यवस्था नहीं है। हार्ट ट्रांसप्लांट इस वक्त सबसे अधिक दक्षिण भारत के विशेषज्ञ कर रहे हैं। लाइसेंस मिलने के बाद यहां भी शुरू हो जाएगा। हाइब्रिड ऑपरेशन थिएटर की प्रक्रिया मार्च के पहले पूरी कर लेंगे। इसी क्रम में उपकरण भी आते रहेंगे।
हाइब्रिड ऑपरेशन थिएटर की स्वीकृति मिलना अहम बात है। यह थिएटर अभी किसी मेडिकल कॉलेज के पास नहीं है। इससे हार्ट ट्रांसप्लांट सेंटर की राह खुल गई है। हार्ट डोनेशन के संबंध में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के न्यूरो साइंसेज विभाग से बात की थी। विभाग से टाई अप किया जाएगा। हादसों के कई घायल ब्रेन डेड की स्थिति में पहुंच जाते हैं। उनका हृदय दान किया जा सकता है। -प्रोफेसर राकेश वर्मा, निदेशक एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट
हार्ट ट्रांसप्लांट में ये जांचें की जाती हैं
- ब्लड ग्रुप और आरएच फैक्टर।
- एचएलए टाइपिंग, टिश्यू मैचिंग।
- हेपेटाइटिस बी, सी और एचआईवी जांचें।