गो पालन करने वालो को ग्वाला कहते हैं। मौनिया व्रत की परंपरा कृष्ण से जुड़ी है। इसमें गाय को मौन होकर केवल मोरपंख की सहायता से चराया जाता है। एक समय भोजन करने के साथ नंगे पैर रहा जाता है। केवल गोसेवा की जाती है, अतिरिक्त कोई कार्य नहीं।
कापालिकों की साधना
चित्रकूट के परिक्षेत्र में महाराज अत्रि और मां अनुसुइया के पहले पुत्र दत्रात्रेय भगवान शंकरजी के ही प्रतिरूप थे। शैव सम्प्रदाय में इन्हें प्रथम आचार्य माना जाता है। स्वामी मछन्दरनाथ से लेकर योगी गोरखनाथ आदि इसी परंपरा के संत हैं। दिवाली की महानिशा में अनुसुइया आश्रम से लेकर स्फटिक शिला के महाश्मशान तक हजारों कपालिक साधनाएं करते दिखाई देते हैं।
पौराणिक कथा है कि राजा दक्ष की पुत्री सती का हवन कुंड से लेकर मृत शरीर लेकर जब महादेव पूरे ब्रम्हांड पर भ्रमण कर रहे थे, तो श्रीहरि विष्णु ने उन्हें काटने के लिए सुदर्शन चक्र को भेजा। चक्र से काटे गए अंग जहां गिरे तुरन्त पाषाण में परिवर्तित हो गए। ये 51 शक्तिपीठ बने। भारत मे 34, नेपाल, पाकिस्तान, बंग्लादेश में अन्य है। चित्रकूट में उनका दायां वक्ष (स्तन) गिरा था। आज भी यह परिक्रमा मार्ग पर चक्र तीर्थ पर सुदर्शन चक्र के साथ विद्यमान है। शक्ति आराधना के इस स्थल पर माँ मोक्षदा की आराधना होती है। वैसे माँ सीता जी ने यहाँ पर माँ दुर्गा व श्री राम ने वनदेवी की आराधना की थी।
बिहार के सोनपुर मेले के बाद देश के सबसे बड़े गधा मेले के रूप में चित्रकूट के नयागांव क्षेत्र में मेला चल रहा है। वैसे तो इसका कोई लिखित इतिहास नही है,पर स्थानीय आयोजक इसे सैकड़ों साल पुराना बताते हैं। पांच साल पहले यहां पर एक गधा 3 लाख का बिका था।
देश भर से आए नागवंशीय
चित्रकूट के जंगलों में औषधियों की भरमार है, सदियों से दीपावली की रात में यहां पर नागवंशीय जड़ियों को अभिमंत्रित कर उनका उपयोग करने के लिए आते रहे हैं। दो दिन पूर्व से चित्रकूट में आकर ये लोग डेरा डाल चुके हैं।