साउथ सिटी में बंदरों का आतंक बढ़ने से लोगों में दहशत है। कभी गुजैनी में बच्चों की चीख पुकार मचती है तो कभी बाबूपुरवा में लोग हाथों में लाठी-डंडे लेकर बंदरों को दौड़ाते नजर आ रहे हैं।
साउथ के बर्रा, जरौली, किदवईनगर इलाकों में भी बंदरों का आतंक है। सबकी जुबां पर एक ही सवाल है कि आखिर इतने बंदर आ कहां से गए।
‘अमर उजाला’ ने पड़ताल की तो सामने आया कि साउथ सिटी के लगातार विस्तार होते जाने, बाईपास के पार भी पेड़ काटकर बस्तियां बसाने से बंदरों का प्राकृतिक आशियाना छिन गया है और वे बाईपास के इधर-उधर इलाकों में दर-बदर भटक रहे हैं कभी यहां कभी वहां।
एक समय था जब साउथ सिटी में बाईपास पार जंगल हुआ करता था। अब जहां तक देखिए, बस्तियां आबाद हैं। भौंती, बिधनू, रामादेवी तक लगातार बस्तियां बस गई हैं। पहले बाईपास फिर हाईवे बनाने के लिए बेतरतीबी से जंगल काटे गए।
बचे-खुचे पेड़ आगरा हाईवे की भेंट चढ़ गए। मेहरबान सिंह का पुरवा से आगे तक जहां कभी जंगल और खेत हुआ करते थे, आज ऊंची-ऊंची इमारते हैं।
बाग और खेत थे बंदरों के अशियाने
सतबरी रोड के पास रहने वाले सुनील तिवारी बताते हैं कि आठ से दस साल पहले रोड के पास पड़ी लगभग डेढ़-दो सौ बीघा जमीन पर खेत और बाग हुआ करते थे। यहां पर सैकड़ों बंदर रहते थे। अब यहां केडीए और सोसाइटी के मकान बन गए हैं और बंदर यशोदानगर की ओर कूच कर गए।
इन इलाकों से आया बंदरों का झुंड
साउथ के नवविकसित गोपाल नगर, स्वर्ण जयंती विहार, कोयला नगर, शताब्दी नगर, सनिगंवा, अंबेडकर नगर, बर्रा गांव, खाड़ेपुर, दुर्गा बिहार, द्विवेदी नगर, बौद्व नगर, सागरपुरी, चंदारी, सुजातगंज, श्याम नगर, सीओडी आदि ऐसे इलाके है, जहां डेढ़ दशक पहले तक जंगल था। आज मकान ही मकान हैं। यहां से बंदरों का पलायन हुआ तो वे आबादी के बीच आ गए।
बंदर को गोली मारने वाले गार्ड पर मुकदमा दर्ज
कानपुर(ब्यूरो)। बंदर को गोली मारकर मौत के घाट उतारने के आरोप में कैंट स्थित क्लब के गार्ड गुलाब सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
कैंट सीओ सुशील घुले ने बताया कि सोमवार को हुई घटना के बाद रेंजर आईबी सिंह की तहरीर पर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9/51 और पशु क्रूरता अधिनियम में रिपोर्ट दर्ज की गई है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9/51 में तीन से सात साल की सजा का प्रावधान है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी एयरगन की गोली लगने से बंदर की मौत की पुष्टि हुई है।