कानपुर में बिरहाना रोड के तपेश्वरी देवी मंदिर का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि माता सीता ने इस मंदिर में लव और कुश का मुंडन संस्कार कराया था। पुजारी पं. शिव मंगल बताते हैं कि इस मंदिर की मान्यता सिद्धपीठ के रूप में है। उन्होंने बताया कि जब लंका पर विजय प्राप्त कर प्रभु श्रीराम वनवास से लौटे तो अयोध्यावासी माता सीता के ही चरित्र पर सवाल उठाने लगे।
इस पर भगवान राम ने सीता को त्याग दिया था। इसके बाद लक्ष्मण माता सीता को बिठूर स्थित वाल्मीकि जी के आश्रम में छोड़ आए थे। कहा जाता है कि माता सीता के तप से ही तपेश्वरी माता प्रकट हुईं थीं। इसके बाद यहां पर एक छोटी मठिया की स्थापना की गई थी। तब पुत्तू लाल इस मंदिर की रखवाली किया करते थे।
उनके निधन के बाद उनके बेटे मन्नू लाल ने इस मंदिर का निर्माण कराया। इसके बाद मन्नू के बड़े बेटे लक्ष्मी नारायण ने यहां शेर की मूर्ति की स्थापना कराई, जो आज भी है। उन्होंने मंदिर का सुंदरीकरण भी कराया। मान्यता है कि माता के सामने शीश झुकाने और अखंड ज्योति जलाने से मनोकामना पूरी होती है।