बच्चों को घटिया जूते और बैग की आपूर्ति कर दी गई और नतीजा यह हुआ कि चार माह में ही बांट गए जूते, मोजे की हकीकत सामने आ गई। कई बच्चों के जूतों में छेद हो गया और मोजों की सिलाई खुल गई है। बच्चेे फटे जूते या चप्पलें पहन कर स्कूल जा रहे हैं। जूतों के साथ बच्चों के स्कूली बैग भी फट गए। बच्चे स्कूल में घर का बना बैक या फटे बैग में प्लास्टिक की थैली लगाकर स्कूल ला रहे है।
खराब गुणवत्ता के कारण जूते, मोजे छह माह में ही दगा देने लगे, किसी में छेंद हो गया तो किसी का फटा, किसी की सिलाई खुलने लगी। अमृतपुर क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय गांधी के छात्र प्रशांत, नरेंद्र व मंजेश कहना है कि जूते फटने लगे है। इस कारण वह कभी फटे जूते पहन कर स्कूल आते तो कभी चप्पल पहन कर आते है। इसी स्कूल की छात्रा मुस्कान, सोनी का बताया कि उनके मोजों में छेंद होने के कारण खराब हो गए है। प्राथमिक विद्यालय महमदपुर गढ़िया की छात्रा पिंकी ने बताया कि उनका जूता फट गया है। संध्या ने बताया कि मोजा खराब हो गया है। जो बैग मिला उसकी कुछ जगह सिलाई खुल गई और कुछ जगह से फट गया है। इस कारण पालीथीन बैग के अंदर लगा ली है, जिससे कापी किताबें रखकर स्कूल आती है।
4.57 करोड़ हो गए खर्च
परिषदीय स्कूलों के बच्चों के लिए जूते-मोजे और स्कूली बैग में करीब 4.57 लाख रुपये का बजट आया था। जिसका भुगतान कर दिया गया। गाजियाबाद की फर्म पावरटेक इंफ्राटेक को जूता सप्लाई का 2.25 करोड़ रुपये भुगतान किया गया। कोलकाता की खादिम इंडस्ट्रीज फर्म को मोजे सप्लाई का 70 लाख रुपये और लखनऊ की फर्म को बैग सप्लाई के 1.59 लाख रुपये भुगतान किया गया। जूता प्रति बच्चा 135 रुपये, मोजा 21 रुपये 75 पैसा प्रति बच्चा और प्रति बैग 149 रुपये के हिसाब से खरीदा गया था।